हिंदी साहित्य को समर्पित मंच
श्री युगल किशोर जी की स्मृति और साहित्यिक चेतना को समर्पित गरिमामय मंच
पढ़ें
जुड़ें
श्री युगल किशोर अग्रवाल जी : स्मृतियों में जीवंत एक आदर्श व्यक्तित्व

6 अक्टूबर का दिन हमारे परिवार के लिए केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि उस पावन स्मृति का प्रतीक है, जब वाराणसी की पुण्यभूमि पर एक ऐसे व्यक्तित्व का जन्म हुआ, जिसने अपने जीवन के प्रत्येक पड़ाव को संघर्ष, कर्मठता, संवेदना, प्रेम और पारिवारिक उत्तरदायित्व से सार्थक बनाया। हमारे पापा जी, श्री युगल किशोर अग्रवाल जी का सम्पूर्ण जीवन हमारे लिए केवल एक जीवन-कथा नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रेरणागाथा है, जिसमें संघर्षों के बीच मुस्कुराना, जिम्मेदारियों के बीच अपनों का हाथ थामे रहना और जीवन के प्रत्येक रिश्ते को प्रेम से सींचना सीखा जा सकता है। आज भले ही वे भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व, उनका स्नेह, उनकी वाणी, उनकी मुस्कान और उनके संस्कार आज भी हमारे जीवन में उसी तरह उपस्थित हैं, जैसे किसी शांत दीपक की लौ अंधेरे में निरंतर अपना प्रकाश बिखेरती रहती है।वाराणसी की पावन धरती पर जन्मे श्री युगल किशोर अग्रवाल जी की प्रारम्भिक शिक्षा अग्रसेन महाजनी महाविद्यालय से हुई। बचपन से ही वे अध्ययनशील, जिज्ञासु और कर्मठ प्रवृत्ति के थे। उन्होंने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा विज्ञान विषय से पूर्ण की। इसके बाद उन्होंने काशी विद्यापीठ से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उनका विषय शास्त्रीय रहा। शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं था, बल्कि वे जीवन को निरंतर सीखने और आगे बढ़ने की प्रक्रिया मानते थे। यही कारण था कि पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने अपने जीवन को व्यावहारिक धरातल पर भी आगे बढ़ाने का प्रयास किया। स्नातक की पढ़ाई करते हुए ही उन्होंने डी.एल.डब्ल्यू. में इलेक्ट्रॉनिक की दुकान प्रारम्भ की। एक ओर पढ़ाई चल रही थी तो दूसरी ओर व्यवसाय की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर थी। यह उनके परिश्रम, आत्मनिर्भरता और दूरदर्शिता का परिचायक था कि उन्होंने परिस्थितियों को कभी अपने विकास की राह में बाधा नहीं बनने दिया। उनके मन में एक स्वप्न भी था—काश, उनकी नौकरी किसी बैंक में लग जाए। शायद उनकी सच्ची इच्छा और निरंतर प्रयासों को ईश्वर ने भी स्वीकार किया। अंततः उनका चयन यूको बैंक में हेड कैशियर के पद पर हुआ। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। नौकरी ने उन्हें आर्थिक स्थिरता प्रदान की, लेकिन उनके व्यक्तित्व की वास्तविक समृद्धि उनके मानवीय गुणों में थी। वे अपने कार्य के प्रति ईमानदार, अनुशासित और जिम्मेदार थे। जीवन में चाहे कितनी भी व्यस्तताएँ रही हों, परिवार और अपनों के लिए उनके हृदय में सदैव पर्याप्त स्थान रहा। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी का जीवन संघर्षों से अछूता नहीं रहा। बल्कि उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता ही यह थी कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों का सामना धैर्य और साहस के साथ किया। अपने पिताजी के देहांत के बाद परिवार की जिम्मेदारी जिस प्रकार उन्होंने अपने कंधों पर उठाई, वह उनके त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने केवल अपने जीवन के बारे में नहीं सोचा, बल्कि छोटे भाइयों के भविष्य को सँवारने का दायित्व भी अपने ऊपर लिया। उन्हें व्यापार के लिए सहयोग और मार्गदर्शन दिया, ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। अपनी बहनों के विवाह के लिए भी उन्होंने पूरी जिम्मेदारी निभाई और उनके सुखी भविष्य की चिंता की। परिवार के प्रत्येक सदस्य के जीवन को व्यवस्थित करने में उनका योगदान इतना गहरा था कि वे केवल परिवार के एक सदस्य नहीं, बल्कि परिवार के मजबूत आधारस्तंभ बन गए थे। अपने बच्चों की शिक्षा और भविष्य को लेकर भी वे सदैव सजग रहे। उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, अच्छे संस्कार दिए और उन्हें जीवन में अपने पैरों पर खड़े होने योग्य बनाया। उनके लिए बच्चों की सफलता केवल नौकरी या आर्थिक उपलब्धि नहीं थी; वे चाहते थे कि उनके बच्चे अच्छे इंसान बनें, अपने संस्कारों को न भूलें और दूसरों के सुख-दुःख में सहभागी बनें। आज उनके परिवार के सदस्यों के व्यक्तित्व और जीवन में जो भी अच्छाइयाँ दिखाई देती हैं, उनमें उनके संस्कारों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
श्री युगल किशोर अग्रवाल जी धार्मिक आस्था से भी गहराई से जुड़े हुए थे। वे संकठा माता के परम भक्त थे। वाराणसी की धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कृति से उनका विशेष लगाव था। उनकी आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके व्यवहार और जीवन-मूल्यों में भी दिखाई देती थी। ईश्वर के प्रति विश्वास ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य प्रदान किया और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति दी।उनके व्यक्तित्व का एक अत्यंत सुंदर पक्ष उनका साहित्य-प्रेम था। कथा-साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। साहित्य उनके लिए केवल पढ़ने का माध्यम नहीं था, बल्कि भावनाओं, विचारों और मानवीय संवेदनाओं को समझने का एक सुंदर मार्ग था। वे शब्दों की दुनिया से आत्मीय संबंध रखते थे। शायद यही कारण था कि उनके भीतर संवेदनशीलता इतनी गहरी थी। वे मनुष्य के दुःख को समझते थे, उसकी पीड़ा को महसूस करते थे और जहाँ संभव होता, वहाँ सहायता के लिए तत्पर रहते थे। लेकिन यदि उनके व्यक्तित्व का कोई पक्ष उनके जीवन की धड़कन कहा जाए, तो वह था- संगीत। संगीत उनके लिए केवल रुचि नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा था। जब तबले पर उनकी उंगलियाँ पड़ती थीं तो ऐसा लगता था मानो सुरों और तालों का कोई निर्मल झरना बह निकला हो। तबले की थाप में उनकी आत्मा की प्रसन्नता सुनाई देती थी। वे भजन भी बहुत मधुरता और भावपूर्ण ढंग से गाते थे। उनके स्वरों में केवल संगीत नहीं, बल्कि श्रद्धा, प्रेम और आत्मीयता का भाव समाया रहता था। परिवार के बीच जब वे भजन गाते या तबला बजाते, तो वह समय आज भी स्मृतियों में किसी अनमोल धरोहर की तरह सुरक्षित है। उनका स्वभाव अत्यंत स्नेहिल था। वे जिस व्यक्ति से मिलते, उसके प्रति आत्मीयता का भाव सहज रूप से उत्पन्न हो जाता। उनके हृदय में करुणा थी, असीम प्रेम था और दूसरों की सहायता करने की अद्भुत तत्परता थी। वे अपनेपन की ऐसी छाया देते थे, जिसमें व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित और प्रिय महसूस करता था। उनके स्नेह में किसी प्रकार का दिखावा नहीं था; वह सहज, स्वाभाविक और हृदय से निकला हुआ था। शायद यही कारण था कि उनसे जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में उनके लिए विशेष स्थान बन गया।
इतना स्नेह, इतनी ममता और इतना अपनापन पाकर परिवार के सभी सदस्य स्वयं को सौभाग्यशाली अनुभव करते थे। वे परिवार के लिए केवल पिता नहीं थे, बल्कि मार्गदर्शक, संरक्षक, मित्र और जीवन के कठिन रास्तों पर दिशा दिखाने वाले दीपस्तंभ थे। उनका व्यक्तित्व जितना सरल था, उतना ही महान भी। उन्होंने जीवन में बहुत कुछ सहा, बहुत कुछ किया और बहुतों के जीवन को सँवारा, लेकिन कभी अपने त्याग का प्रदर्शन नहीं किया। यही उनकी महानता थी। आज वे हमारे बीच नहीं हैं। समय आगे बढ़ गया है, जीवन अपनी गति से चल रहा है, लेकिन स्मृतियों की दुनिया में समय ठहर जाता है। उनकी बातें, उनका स्नेह, उनकी मुस्कान, उनका संगीत, उनका आशीर्वाद और परिवार के प्रति उनका समर्पण आज भी हमारे हृदय में जीवित है। उनकी अनुपस्थिति एक ऐसी रिक्तता है, जिसे कोई भर नहीं सकता। फिर भी उनके दिए हुए संस्कार उस रिक्तता को शक्ति में बदल देते हैं। जब जीवन में कोई कठिनाई आती है, तो लगता है जैसे उनकी कही हुई कोई बात भीतर से साहस दे रही हो; जब कोई सफलता मिलती है, तो मन अनायास उनकी ओर देखता है और लगता है कि कहीं दूर से वे मुस्कुराकर आशीर्वाद दे रहे हैं। हमारे लिए वे कभी स्मृतियों से दूर नहीं हो सकते। शरीर चला जाता है, लेकिन प्रेम कभी नहीं जाता; व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसके संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी भी हमारे जीवन में अपने संस्कारों, अपने प्रेम और अपनी अनगिनत मधुर स्मृतियों के रूप में सदैव जीवित रहेंगे। हमें विश्वास है कि उनका स्नेह आज भी हमारे परिवार पर उसी तरह बरस रहा है और उनकी अदृश्य छत्रछाया हमें निरंतर संबल प्रदान कर रही है। हमारी यही प्रार्थना है कि जहाँ कहीं भी वे हों, हमें अपना आशीर्वाद देते रहें, हमारी राहों को प्रकाश देते रहें और हमारे जीवन को अपने संस्कारों के अनुरूप सार्थक बनाने की प्रेरणा देते रहें। हमारे पापा जी, हमारे मार्गदर्शक, हमारे अपने श्री युगल किशोर अग्रवाल जी आप हमारे बीच भले ही नहीं हैं, पर हमारी धड़कनों, हमारी स्मृतियों, हमारे संस्कारों और हमारे प्रेम में आप सदैव जीवित रहेंगे- चिरकाल तक।
साहित्यिक रचनाएँ
लेखक परिचय
साहित्य समाचार
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
editor@yugalkishorepatrika.in
(+91) 9819273616
MUMBAI MAHARASHTRA
