कभी-कभी सोचता हूँ,
आखिर इंसान को चाहिए कितना?
दो वक्त की रोटी, थोड़ा सुकून,
और कोई अपना, जो पूछ ले—
“सब ठीक है न?”
लेकिन शायद हम इतने में कहाँ मानते हैं,
थोड़ा मिल जाए तो और की चाह रखते हैं।
पैसा हो तो और पैसे की चाह,
नाम हो तो और नाम की,
और कोई अपना हो,
तो उस पर भी पूरा अधिकार चाहते हैं।
धीरे-धीरे समझ आया,
कि हर चीज़ बुरी नहीं होती,
बस ज़रूरत से ज़्यादा होने पर
वही चीज़ हमें अपने वश में कर लेती है।
कभी पैसा कमाने का जुनून,
कभी तारीफ़ सुनने की आदत,
कभी किसी को पाने की ज़िद,
तो कभी हर जगह ख़ास बनने की चाहत।
हम जिसे अपनी खुशी समझते हैं,
कभी-कभी वही हमारी बेचैनी बन जाती है।
अब लगता है,
ज़िंदगी में सब कुछ होना ज़रूरी नहीं,
जो है, उसमें खुश रहना भी एक हुनर है।
क्योंकि मैंने इतना तो समझ लिया है—
ज़रूरत पूरी हो जाए, तो सुकून मिलता है,
और चाहत हद से बढ़ जाए,
तो इंसान खुद से ही दूर हो जाता है।
अब कोशिश है कि
हर चीज़ को उसकी जगह दूँ,
किसी से उम्मीद रखूँ,
पर अपनी खुशी उसके हवाले न करूँ।
आखिर में बस इतनी-सी बात समझ आई है—
हर नशा बोतल में नहीं होता,
कुछ नशे दौलत के होते हैं,
कुछ शोहरत के,
कुछ मोहब्बत के,
और कुछ इस गलतफहमी के
कि हमारे बिना किसी का काम नहीं चलेगा।
शायद ज़िंदगी जीने का सलीका यही है—
ज़रूरतें पूरी करो,
ख्वाहिशें पालो,
लेकिन किसी भी चीज़ को
खुद से बड़ा मत होने दो।
