हिन्दी साहित्य को समर्पित
कभी-कभी सोचता हूँ, आखिर इंसान को चाहिए कितना? दो वक्त की रोटी, थोड़ा सुकून, और कोई अपना, जो पूछ ले— “सब ठीक है न?” लेकिन शायद हम इतने में कहाँ…
“जो भीतर रह गया” — रिश्तों, प्रेम और वियोग के मुक्तक डूबती नाव को साहिल का किनारा मिला है, रेत को जैसे कोई चाँद सितारा मिला है। मैं चुकाऊँ भी…
आज का दिन मेरे लिए थोड़ा अलग था। अचानक मेरे पुराने बच्चों के दो ग्रुप मिल गए। कई साल बाद उनके चेहरे सामने थे और लगा जैसे समय ने एक…
बेरोज़गार हूँ, बेकार नहीं कभी शब्दों से दुनिया सजाई थी, कभी सपनों की फसल उगाई थी, आज उन्हीं हाथों में खालीपन है, जिन हाथों ने कलम थामकर अपनी पहचान बनाई…
उस सुरमई लिबास में जब वो सामने आती हैं, सादगी से ही जाने कितने रंग चुरा ले जाती हैं। माथे की वो नन्ही-सी चमक, कानों में झुमके प्यारे, मुस्कान उनकी…
ये साल तुम्हारा खास है, सपनों का विश्वास है, किताबें हैं, कुछ मुश्किलें हैं, लेकिन मंज़िल भी पास है। कभी सवाल समझ न आए, कभी मन पढ़ने से घबराए, ऐसे…
जिस दिन एक बेटी जन्म लेती है, उस दिन केवल एक बच्ची इस दुनिया में नहीं आती, बल्कि उसी क्षण एक पिता के जीवन का नया अध्याय भी शुरू हो…
कक्षा में जब मैं पहुँचा था, मन में नए विचार लिए, ज्ञान की ज्योति जलाने को, कुछ सुंदर से उपहार लिए। कुछ आँखों में जिज्ञासा थी, कुछ चेहरों पर मुस्कान…
गूंगे इंसान देख कर अन्याय को ना उठा सके आवाज, हम विहीन इस समाज को ना दे सके सत्य का साथ। वह गूंगे हकदार हैं हम। चीखती है बेबसी जब,…
अंदर की खामोशी” किस बात का दिखावा करूँ मैं, जब भीतर ही भीतर टूट रही हूँ। न कोई तमाशा रचा जीवन में, बस चुपचाप खुद से ही रूठ रही हूँ।…