शब्द पर्याप्त नहीं! (छंदमुक्त कविता)

क्यों करते हो तलाश
शब्दों में मुझको…..?
जितना सोचती हूँ मैं
उतना लिख नहीं पाती,
चाहती हूँ उकेरना
दिल के भावों को
अपनी पीड़ा को,
पर उस गहराई को
उस वेदना को
माप नहीं पाते शब्द…
धरा रह जाता है ज्ञान…
इस स्थिति में
हृदय की मासूमियत
ढूँढती है सहारा
नवल शब्दों का…
और बेचारे शब्द
बेबसी में सिमटे
स्वयं में खोये
गुम से हो जाते हैं ,
स्याही को
नहीं दे पाते सहारा
बस बनकर नमी
पाते हैं आसरा
स्वप्निल आँखों में…..
कभी-कभी
ढुलक आते हैं गालों पर,
हाँ ! मुझे वाणी देने के लिए
शब्द पर्याप्त नहीं हैं………..!

— डॉ. नीता सुशील अग्रवाल #स्वरचित
पूरनपुर (पीलीभीत), उत्तर प्रदेश

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *