आज का दिन मेरे लिए थोड़ा अलग था।
अचानक मेरे पुराने बच्चों के दो ग्रुप मिल गए।
कई साल बाद उनके चेहरे सामने थे और लगा जैसे समय ने एक पल के लिए अपनी रफ्तार रोक दी हो—
जैसे मेरी पुरानी कक्षा, पुरानी आवाजें और पुराने दिन फिर मेरे सामने आकर खड़े हो गए हों।
पहला ग्रुप मिला तो बच्चियों ने मुझे देखते ही बड़े सम्मान और अपनापन से पूछा—
“सर, पहचान रहे हैं न?”
मैं मुस्कुराया और कहा—
“तुम लोगों को कैसे भूल सकता हूँ!”
सच यह था कि नाम मुझे याद थे,
लेकिन आठ-नौ साल बाद अचानक सामने आने पर यादों की पुरानी किताब के पन्ने तुरंत नहीं खुले।
एक ने तुरंत परीक्षा ले ली—
“तो बताइए, मेरा नाम क्या है?”
मैंने क्षणभर सोचा…
और तभी नजर उसके आई-कार्ड पर चली गई। 😄
नाम देखा और बता दिया।
उस पल लगा जैसे सिर्फ एक नाम नहीं बताया,
बल्कि अपने अतीत का एक पन्ना फिर से पढ़ लिया हो।
यही तो वे बच्चियाँ थीं जो कभी छोटी-छोटी बातों पर आपस में उलझती थीं,
फिर मेरी तरफ देखकर शिकायत करती थीं—
“सर, आप पक्षपात करते हैं!” 😄
आज वही बच्चियाँ बड़ी होकर मेरे सामने खड़ी थीं।
चेहरे बदल गए थे, कद बढ़ गया था, उम्र आगे निकल गई थी…
लेकिन उनकी आवाज़ में वही पुराना अपनापन था।
उनसे मिलकर मन अभी उस पुरानी कक्षा की यादों से बाहर भी नहीं निकला था कि दूसरा ग्रुप सामने आ गया।
दूर से ही आवाज आई—
“अरे राहुल सर!”
मैंने पलटकर देखा।
चेहरा जाना-पहचाना-सा लगा, लेकिन इस बार यादों ने जैसे थोड़ी देर और माँग ली।
वह पास आया, आदर से अभिवादन किया और पूछा—
“सर, भूल गए हमें?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“नहीं… भूला नहीं हूँ।”
लेकिन सच यह था कि उस क्षण मुझे उसका चेहरा तक ठीक से याद नहीं आ रहा था।
और शायद यही बात भीतर कहीं चुभ भी गई।
जिस बच्चे को कभी रोज़ पढ़ाया होगा,
जिसकी कॉपी देखी होगी,
जिसकी गलतियाँ सुधारी होंगी,
जिसके सवालों का जवाब दिया होगा—
आज वही सामने खड़ा था और मेरी स्मृति उसके चेहरे तक पहुँचने में असमर्थ थी।
लेकिन वह मुझे पहचान रहा था।
वर्षों बाद भी।
उस क्षण दोनों मुलाकातों का अंतर मेरे भीतर कहीं जुड़ गया।
पहले ग्रुप ने मुझे मेरी पुरानी कक्षा की यादें लौटा दीं,
दूसरे ग्रुप ने मुझे यह एहसास कराया कि मेरी कक्षा से निकलने के बाद भी मैं शायद उनकी यादों में कहीं रह गया था।
एक तरफ वे बच्चे थे जिनके नाम यादों में कहीं सुरक्षित थे,
दूसरी तरफ वह बच्चा था जिसका चेहरा मैं भूल चुका था,
लेकिन जिसने मुझे भूलने नहीं दिया।
आठ-नौ साल बहुत होते हैं।
बच्चे बड़े हो जाते हैं,
चेहरे बदल जाते हैं,
आवाज़ों में परिपक्वता आ जाती है,
और हमारी स्मृतियों में भी बहुत कुछ धुंधला पड़ जाता है।
आज उन्हें देखकर पहली बार इस बात का एहसास कुछ ज्यादा गहराई से हुआ कि
शिक्षक की कक्षा खत्म हो जाती है, लेकिन उसके विद्यार्थियों के जीवन में उसकी मौजूदगी शायद वहीं खत्म नहीं होती।
और सच कहूँ तो,
आज यह सब लिखते हुए मैं थोड़ा भावुक हूँ।
क्योंकि शिक्षक के रूप में हम रोज़ बच्चों को पढ़ाते हैं और फिर वे चले जाते हैं।
हम अगले बैच के साथ व्यस्त हो जाते हैं।
कुछ नाम याद रहते हैं, कुछ चेहरे धुंधले पड़ जाते हैं।
लेकिन कहीं किसी बच्चे की स्मृति में
हम अब भी वही “सर” होते हैं।
आज समझ आया—
शिक्षक शायद अपने सभी विद्यार्थियों को याद नहीं रख पाता,
लेकिन उसके विद्यार्थी उसे याद रखते हैं—
और कभी-कभी वर्षों बाद अचानक सामने आकर
उसकी अपनी ही जिंदगी का एक भूला हुआ अध्याय फिर से खोल देते हैं।
आज मेरे लिए ऐसे ही दो अध्याय खुले।
एक में पुरानी शरारतें थीं,
दूसरे में वर्षों पुराना अपनापन।
और दोनों के बीच एक ही रिश्ता था—
मैं उनका शिक्षक था…
और वे आज भी मेरे विद्यार्थी थे।
राहुल सोनी
एजुकेशन कॉर्नर
हसन बाजार भोजपुर बिहार
