बेरोज़गार हूँ, बेकार नहीं

बेरोज़गार हूँ, बेकार नहीं

कभी शब्दों से दुनिया सजाई थी,
कभी सपनों की फसल उगाई थी,
आज उन्हीं हाथों में खालीपन है,
जिन हाथों ने कलम थामकर
अपनी पहचान बनाई थी।

लोग पूछते हैं—
**“क्या करते हो आजकल?”**
मैं मुस्कुराकर टाल देता हूँ,
क्योंकि हर सवाल का जवाब
रोज़गार नहीं होता।

हाँ, मैं बेरोज़गार हूँ,
मगर बेकार नहीं हूँ।
मेरे भीतर अब भी हुनर साँस लेता है,
मेरी आँखों में अब भी
एक बेहतर कल रहता है।

कभी किताबों के बीच बैठकर
बच्चों के सपने पढ़े हैं मैंने,
कभी अपने शब्दों में
दूसरों के दर्द लिखे हैं मैंने।
आज अपनी कहानी लिखने बैठा हूँ,
तो कागज़ भी पूछता है—
**“तुम्हारा हिस्सा कहाँ है?”**

कभी जेब की खामोशी चुभती है,
कभी अपनों की उम्मीद डराती है,
कभी लगता है शायद
मैं पीछे छूट गया हूँ—
फिर भीतर से कोई आवाज़ आती है,
**“रुकना हारना नहीं होता।”**

मैंने वक्त को बदलते देखा है,
लोगों को बदलते देखा है,
कल जो साथ खड़े थे मेरे,
उन्हें भी धीरे-धीरे दूर जाते देखा है।

लेकिन मैंने खुद को
अब तक नहीं छोड़ा है।

इसलिए आज भी
अपने सपनों की धूल झाड़ता हूँ,
गिरता हूँ, संभलता हूँ,
और फिर एक नया रास्ता तलाशता हूँ।

क्योंकि—

**रोज़गार का न होना
मेरी काबिलियत का प्रमाण नहीं,
यह सिर्फ मेरे जीवन का
एक कठिन अध्याय है।**

कहानी अभी बाकी है,
कलम अभी मेरे हाथ में है,
साँसों में अभी उम्मीद है,
और जब तक उम्मीद ज़िंदा है—
मैं भी ज़िंदा हूँ।

**हाँ, मैं बेरोज़गार हूँ…
लेकिन बेकार नहीं।
आज शायद मेरी कीमत कम आँकी जा रही है,
पर मैं अपनी कीमत
खुद से कम नहीं आँकूँगा।**

—

**रचनाकार परिचय:**

**राहुल कुमार**
शिक्षक, लेखक एवं शोधार्थी (शिक्षा)
संस्थापक-निदेशक, एजुकेशन कॉर्नर एचबी
हसन बाज़ार, भोजपुर (बिहार)

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