मेरी कक्षा के दो सितारे

किसी शिक्षक के लिए इससे बड़ा सौभाग्य शायद ही कुछ हो कि उसकी कक्षा में प्रतिभा केवल दिखाई ही न दे, बल्कि रोज़ उसके सामने आकार लेती रहे। किताबों के पन्नों के बीच कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिन्हें देखते हुए शिक्षक को लगता है कि वह केवल पाठ नहीं पढ़ा रहा, बल्कि भविष्य को अपने सामने धीरे-धीरे बनते हुए देख रहा है।
मेरी कक्षा में ऐसी ही दो छात्राएँ हैं।
दोनों पढ़ने में बेहद तेज। दोनों अपने-अपने समूह की पहचान। दोनों के बीच एक अनकहा-सा मुकाबला—और दोनों की अपनी अलग दुनिया।
एक गणित की ऐसी खिलाड़ी है कि कठिन से कठिन सवाल भी उसके सामने ज्यादा देर टिकना नहीं चाहता। वह कक्षा की टॉपर है। अंकों के संसार में उसने अपनी एक अलग जगह बना ली है। उसकी कॉपी में बने हुए हल कभी-कभी शिक्षक के लिए भी एक संतोष की वजह बन जाते हैं।
दूसरी भी किसी मायने में पीछे नहीं। पढ़ाई में तेज होने के साथ-साथ उसके भीतर कला की एक अलग दुनिया भी बसती है। जीवविज्ञान में उसकी रुचि और पकड़ दिखाई देती है, और जब वह कला के संसार में उतरती है, तो लगता है जैसे किताबों से बाहर भी उसकी प्रतिभा के कई रंग हैं।
दोनों अलग-अलग समूहों में हैं।
और शायद इसी वजह से उनकी प्रतिस्पर्धा और भी दिलचस्प हो जाती है।
मैंने कई बार देखा है—सवाल कोई भी हो, क्षेत्र कोई भी हो, चुनौती कैसी भी हो, दोनों की निगाहें जैसे अनायास एक-दूसरे की ओर उठ जाती हैं। कौन पहले जवाब देगा? कौन बेहतर करेगा? कौन इस बार आगे निकलेगा?
कभी एक आगे होती है, कभी दूसरी।
उनकी इस होड़ को देखकर कभी-कभी मन थोड़ा दुखी भी होता है। सोचता हूँ, काश यह प्रतिस्पर्धा एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की नहीं, एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की हो।
लेकिन सच कहूँ तो, उसी क्षण मन के किसी कोने में एक गहरा-सा गर्व भी जन्म लेता है।
क्योंकि हर कक्षा को ऐसे दो विद्यार्थी नहीं मिलते, जो एक-दूसरे के लिए चुनौती भी हों और प्रेरणा भी।
और इस कहानी में मेरे लिए एक संयोग और भी खूबसूरत है।
मैं रसायन विज्ञान पढ़ाता हूँ।
गणित उसकी ताकत है, कला और जीवविज्ञान दूसरी की अपनी दुनिया; लेकिन रसायन विज्ञान के पन्नों पर आकर दोनों को एक ही दुनिया में उतरना पड़ता है।
यहाँ न गणित की टॉपर अलग है, न कला की प्रतिभा अलग।
यहाँ दोनों मेरे सामने एक ही ब्लैकबोर्ड, एक ही समीकरण और एक ही सवाल के साथ खड़ी होती हैं।
और शायद यही मेरे शिक्षक होने का सबसे खूबसूरत सौभाग्य है।
मैं उन दोनों को पढ़ाते हुए कभी-कभी सोचता हूँ—
प्रकृति भी कितनी अद्भुत है।
एक ही कक्षा में दो प्रतिभाएँ रख देती है, दोनों को अलग-अलग रंग देती है और फिर उन्हें एक-दूसरे के सामने बैठाकर कहती है—
“अब देखो, तुम दोनों एक-दूसरे से कितना सीख सकती हो।”
रसायन विज्ञान में हम पढ़ते हैं कि अलग-अलग तत्व मिलकर नई संरचना बनाते हैं। शायद प्रतिभाओं के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।
एक की चमक दूसरी को चुनौती देती है,
दूसरी की उड़ान पहली को और ऊँचा उड़ने का साहस देती है।
मैं नहीं जानता कि भविष्य में इन दोनों में से कौन किस मुकाम तक पहुँचेगी। शायद समय इनके रास्ते अलग कर देगा। शायद आज की यह छोटी-सी कक्षा भविष्य में इनके लिए केवल एक सुंदर स्मृति बनकर रह जाएगी।
लेकिन मेरे लिए ये दोनों हमेशा मेरी उस कक्षा की दो खास कहानियाँ रहेंगी—
एक गणित के अंकों में चमकती हुई,
दूसरी रंगों और जीवविज्ञान में अपनी दुनिया रचती हुई,
और दोनों के बीच खड़ा एक शिक्षक…
जो कभी उनकी प्रतियोगिता देखकर थोड़ा उदास होता है,
तो कभी उसी प्रतियोगिता पर चुपचाप गर्व करता है।
क्योंकि शिक्षक का सौभाग्य केवल यह नहीं कि उसके विद्यार्थी उससे सीखें;
उसका असली सौभाग्य तब है, जब वह अपने विद्यार्थियों को एक-दूसरे से बेहतर बनते हुए देख सके।
और शायद इसी वजह से मुझे अपनी रसायन विज्ञान की कक्षा पर थोड़ा-सा नाज़ है।
वहाँ सिर्फ रासायनिक अभिक्रियाएँ नहीं होतीं—
वहाँ दो प्रतिभाएँ भी लगातार अभिक्रिया करती रहती हैं,
और हर बार कुछ नया जन्म लेता है।
राहुल सोनी
एजुकेशन कॉर्नर
हसन बाजार भोजपुर बिहार
8581020240

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