माँ की बोली से मिला जीवन को पहला मान,
इसी ज़ुबाँ ने दे दिया सपनों को आसमान।
दुनिया भर की भाषाएँ सीखो दिल खोलकर—
पर अपनी जड़ों से कटकर किस बात का अभिमान?
जिस भाषा में माँ ने मुझको पुकारा है,
जिसमें पिता ने जीवन सँवारा है।
दुनिया की हर भाषा सीखो लेकिन—
मत भूलो हिंदी ने तुमको निखारा है।
माँ की बोली में बचपन मुस्काता है,
हर अक्षर अपना-सा हो जाता है।
हिंदी केवल भाषा नहीं जीवन की—
इसके स्वर में पूरा घर गाता है।
— शीतल राज ‘किशोर’
— शीतल राज ‘किशोर’
समस्तीपुर, बिहार
