छोटे छोकरा

होश संभालते ही उसने अपने को बच्चों के झुंड के बीच पाया। वह आश्रम की संचालिका की लाल-लाल आंखें देख कर सहन जाता। सब उस काली मोटी भैंस को बहन जी कहते, वास्तव में वह डायन थी। उसके मुस्तण्डे लाठी में तेल चुपड़ कर बैठे रहते। वह 8 वर्ष का हो गया तो आश्रम की रसीद थमा दी और चंदा वसूल करने वाले बच्चों के साथ जाने लगा।

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