नदियों की पुकार
स्वार्थ में अंधे हो चुके मानव,
क्या तुम्हें नदियों की पुकार सुनाई नहीं देती?
कभी जो नदियाँ जीवन का आधार थीं,
आज वही तुम्हारी लापरवाही से
गंदगी और प्रदूषण का शिकार हो रही हैं।
हमने अपने स्वार्थ के लिए
उनकी निर्मल धारा को मैला कर दिया,
उनके किनारों को कचरे से भर दिया
और फिर भी बेफिक्र होकर आगे बढ़ते रहे।
दिन-ब-दिन पीने योग्य पानी कम होता जा रहा है।
कहीं लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं,
तो कहीं प्यास इंसान की जिंदगी छीन रही है।
हमें बार-बार सिखाया जाता है—
“जरूरत भर पानी का उपयोग करो,
हर बूंद को बचाओ।”
लेकिन हम सुनते हैं,
कुछ पल सोचते हैं
और फिर सब कुछ अपने भीतर से निकाल देते हैं—
जैसे हमें कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
पर याद रखो मानव—
पानी केवल एक संसाधन नहीं,
जीवन की पहली आवश्यकता है।
जिस दिन नदियाँ सूख जाएँगी,
उस दिन तुम्हारी दौलत, तुम्हारी इमारतें
और तुम्हारी सारी सुविधाएँ
तुम्हारी प्यास नहीं बुझा पाएँगी।
आज नदियों की पुकार सुन लो,
आज पानी की कीमत समझ लो।
क्योंकि पानी बचाना केवल प्रकृति को बचाना नहीं,
बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन को बचाना है।
एक बूंद बचाएँ,
एक नदी बचाएँ,
एक जीवन बचाएँ।
