वोट का सौदागर

कहानी
””””””””
वोट का सौदागर
***********†

ग्रामीण अंचल में अवस्थित रेलवे का गोविंदपुर हॉल्ट।

संध्या के पाँच बज चुके थे। नई दिल्ली से आने वाली स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस कुछ देर पहले ही हॉल्ट पर रुकी थी और यात्रियों को उतारकर अगले स्टेशन की ओर बढ़ गई थी। प्लेटफॉर्म पर उतरे गिने-चुने यात्री भी अपने-अपने गंतव्य की ओर जा चुके थे। देखते ही देखते हॉल्ट पर फिर वही निस्तब्धता उतर आई थी, जो हर शाम इस छोटे-से स्टेशन को अपने आगोश में ले लिया करती थी।

दीनदयाल भी दिल्ली से चलकर गोविंदपुर हॉल्ट पहुँचा था। यहाँ से उसका गाँव मोहनपुर लगभग पाँच किलोमीटर दूर था। गाँव में पंचायत चुनाव होने वाला था और उसे अपनी बिरादरी के उम्मीदवार को जिताना था। चुनाव में एक-एक वोट की कीमत थी। शायद यही कारण था कि भानु प्रसाद पिछले पंद्रह दिनों से उसे बार-बार फोन कर गाँव आने के लिए कह रहा था।

दीनदयाल को याद है, जब पहली बार भानु प्रसाद का फोन आया था, तो वह चौंक गया था।

भानु प्रसाद उसके गाँव का जमींदार था। जमीन-जायदाद, मोटर-गाड़ियाँ, आलीशान बंगला, धन-दौलत और शानो-शौकत—किसी चीज की कमी नहीं थी उसके पास। कमी थी तो केवल दयावान हृदय की। मजदूरों का शोषण करना उसके परिवार की पुरानी परंपरा थी। गरीबों और असहायों से सहानुभूति रखना उसने कभी सीखा ही नहीं था।

फिर आज उसे एक गरीब मजदूर की याद कैसे आ गई?

दीनदयाल के मन में उठे इस प्रश्न का उत्तर भानु प्रसाद ने कुछ ही क्षणों में दे दिया था।

“दीनदयाल चाचा, प्रणाम! हम भानु बोल रहल हई। पिछली बात के भूल के हमरा माफ कर दऽ चचा। तू घर के लिए ट्रेन पकड़ ला, आज ही। अब हम अपने खेत और गाँव में ही तोहरा के काम देब। दिल्ली में रहे के कोई जरूरत ना हऽ।”

दीनदयाल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।

भानु प्रसाद—और उसके लिए इतना अपनापन!

उसी क्षण उसे प्राथमिक विद्यालय के मास्टर साहब श्यामा प्रसाद की कही बात याद आ गई—

“सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते।”

दीनदयाल आठवीं कक्षा तक पढ़ा था, लेकिन जिंदगी ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया था। वह मानता था कि अपना आदमी आखिर अपना ही होता है। उसका मन निश्चल था। छल-कपट से वह कोसों दूर था।

धीरे-धीरे उसे भानु की बात सच लगने लगी।

उसने कहा—

“ठीक है, भानु बाबू। हम आज से दस दिन बाद, महीना लगते ही, दो तारीख को गाड़ी पकड़ लेंगे।”

“नहीं चाचा, आप कल ही गाड़ी पकड़ लीजिए।”

भानु जैसे कोई जरूरी बात याद आने पर अचानक बोला—

“एक बात तो कहना ही भूल गए। अबकी बार पंचायत चुनाव हो रहा है। अपनी जाति से गाँव में हम ही मुखिया पद के प्रत्याशी हैं। चार दिनों बाद चुनाव है। आपका एक वोट और आपके परिवार का एक-एक वोट बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे भी आप मजदूरों के नेता हैं। आपके आने से अपनी जाति के लोग गोलबंद हो जाएँगे। और हाँ, अगर आपके पास पैसा-कौड़ी नहीं है तो किसी से लेकर आ जाइए। हम सब पैसा यहाँ दे देंगे।”

एक ही साँस में कही गई इन बातों ने दीनदयाल के मन में विश्वास का एक नया संसार रच दिया।

अगली ही शाम उसने स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस पकड़ ली।

—

गोविंदपुर हॉल्ट से मोहनपुर की दूरी पाँच किलोमीटर थी। साथ में अटैची, झोला और बैग का बोझ था। ऊपर से रिक्शा या टेंपो का कहीं कोई नामोनिशान नहीं।

वह सोच ही रहा था कि गाँव तक कैसे पहुँचेगा कि अचानक उसकी नजर गाँव की ओर जाने वाली सड़क पर पड़ी।

एक चमचमाती सफेद स्कॉर्पियो हॉल्ट की ओर आती दिखाई दी।

कुछ ही क्षणों में गाड़ी उसके सामने आकर रुक गई।

दरवाजा खुला।

भानु प्रसाद बाहर निकला।

वही भानु प्रसाद, जिसे दीनदयाल ‘भानु मालिक’ कहकर संबोधित करता था।

भानु उसके पास आया और अचानक उसके पैरों पर झुक गया।

“आशीर्वाद दीजिए, चाचा! कैसे हैं? सफर में कोई परेशानी तो नहीं हुई?”

भानु लगातार प्रश्न किए जा रहा था।

दीनदयाल अभी कुछ बोल भी नहीं पाया था कि भानु के साथ आए लोगों ने उसका अटैची, झोला और बैग उठा लिया और गाड़ी में रख दिया। भानु ने स्वयं उसका हाथ पकड़कर उसे गाड़ी में बैठाया।

स्कॉर्पियो गाँव की ओर चल पड़ी।

दीनदयाल का मन भाव-विह्वल हो उठा।

इतना सम्मान तो उसने दिल्ली में बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों का देखा था। लेकिन वह तो एक साधारण मजदूर था। उसके लिए इतना आदर!

उसका मन इस परिवर्तन को समझ नहीं पा रहा था।

लेकिन उसका निश्चल मन उसे समझाने लगा—

“जब अंगुलिमाल बदल सकता है, तो भानु प्रसाद क्यों नहीं बदल सकता?”

उसने मन ही मन निश्चय कर लिया—

भानु बाबू को जिताने के लिए वह दिन-रात एक कर देगा। अपना वोट, अपने परिवार का वोट और अपनी बिरादरी के मजदूर भाइयों का एक-एक वोट भानु बाबू के ‘किताब’ छाप पर पड़ेगा।

—

गाँव पहुँचा तो दीनदयाल ने अपने घर में भी बदलाव देखा।

उसका घर हमेशा अभाव का दूसरा नाम रहा था। जब भी वह दिल्ली से घर आता, पत्नी निर्मला घर की जरूरतों और सामान की कमी का रोना रोया करती थी।

लेकिन आज निर्मला के चेहरे पर शिकायत नहीं, खुशी थी।

वह चहकती हुई उसके पास आई।

“कैसे हैं? ठीक तो हैं? सही समय पर आ गए!”

बिना उसके उत्तर की प्रतीक्षा किए वह फिर बोल पड़ी—

“कौन-सा खाना लाऊँ? घर में किसी चीज की कमी नहीं है। भानु मालिक दस हजार रुपये और राशन दस दिन पहले ही भिजवा दिए हैं। बस, आपके आने का इंतजार था।”

दीनदयाल ने पानी पिया, खाना खाया और देर तक घर के इस बदलाव को देखता रहा।

उसके भीतर कृतज्ञता भरती जा रही थी।

उसे लग रहा था, जैसे भानु प्रसाद सचमुच बदल गया है। जैसे वर्षों की दूरी एक झटके में समाप्त हो गई हो।

उसे इस परिवर्तन में ईश्वर की कृपा और अपनेपन के दर्शन होने लगे।

—

परसों चुनाव था। यानी केवल एक दिन शेष था।

दीनदयाल अपनी बिरादरी के मोहल्ले में घूम-घूमकर लोगों से आरजू-विनती करने लगा।

“भानु बाबू हमारे आदमी हैं। अपनी जाति का आदमी है। एक बार मौका दीजिए। हम सबका भला होगा।”

वह अपनी जाति का वास्ता देता, भानु के पुराने व्यवहार को भूलने की सलाह देता और लोगों से उसके पक्ष में मतदान करने की अपील करता।

लोगों ने दीनदयाल की बात मान ली।

चुनाव हुआ।

भानु प्रसाद अपार मतों से मुखिया पद पर निर्वाचित हो गया।

जाति-बिरादरी में तीन दिनों तक उत्सव का माहौल रहा। पूजा-पाठ हुआ। गाजा-बाजा बजा। जुलूस निकला। आगे-आगे भानु प्रसाद और पीछे-पीछे समर्थकों की भीड़।

‘भानु बाबू जिंदाबाद’ के नारों से गाँव की गलियाँ गूँज उठीं।

पंद्रह दिन जीत के जश्न और चर्चाओं में कैसे बीत गए, दीनदयाल को पता ही नहीं चला।

फिर एक दिन उसकी तंद्रा तब टूटी, जब निर्मला ने कहा—

“घर में राशन-पैसा सब खत्म हो गया है। भानु मालिक के पास जाइए। राशन-पैसा लाइए और उनके यहाँ काम भी पकड़ लीजिए।”

दीनदयाल को भानु का वह वादा याद आया—

“अब हम अपने खेत और गाँव में ही तोहरा के काम देब।”

अगली सुबह वह भानु प्रसाद की कोठी पर पहुँच गया।

कोठी पर लोगों की भीड़ लगी थी। दर्जनों लोग भानु प्रसाद को प्रणाम कर अपनी-अपनी समस्याएँ बता रहे थे। कोई सड़क की बात कर रहा था, कोई नाली की, कोई किसी योजना की।

भानु सबकी बातें सुन रहा था।

इसी बीच उसकी नजर दीनदयाल पर पड़ी।

लेकिन बस एक पल के लिए।

फिर उसने नजर फेर ली।

दीनदयाल इंतजार करता रहा।

एक घंटा बीत गया।

भानु ने उसकी ओर दोबारा नहीं देखा।

दीनदयाल को आश्चर्य हुआ।

क्या यही वह भानु था, जिसने कुछ दिन पहले स्टेशन पर उसके पैरों पर झुककर आशीर्वाद लिया था?

शायद काम के बोझ में मौखिक अभिवादन करना भी भूल गया होगा।

आखिरकार दीनदयाल ने हिम्मत जुटाई।

“बबुआ…”

भानु ने उसकी ओर देखा।

दीनदयाल बोला—

“अब घर में खाने को कुछ नहीं है। पैसे-राशन सब खत्म हो गए हैं। आपने अपने गाँव और खेत में काम देने का वचन देकर मुझे दिल्ली से बुलाया था। आज से मैं काम करने आया हूँ। बताइए, कहाँ और कौन-सा काम शुरू करूँ?”

भानु प्रसाद का चेहरा निर्विकार था।

उसने रूखे स्वर में कहा—

“काका, अभी काम-वाम कुछ नहीं है। आप फिर से दिल्ली चले जाइए। छह महीने बाद आइएगा, तब देखेंगे।”

बस इतना ही।

दीनदयाल कुछ क्षण उसे देखता रहा।

उसे लगा, जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से जमीन खींच ली हो।

सिर चकराने लगा।

जिस व्यक्ति ने चुनाव से पहले उसके पैर छुए थे, आज वही उसे पहचानने से इनकार कर रहा था।

दीनदयाल किसी तरह अपने को सँभालकर घर लौट आया।

निर्मला ने उसके चेहरे की ओर देखा।

वह कुछ देर चुप रहा।

फिर धीमे स्वर में बोला—

“सारा सामान बाँध दो… मैं फिर से दिल्ली जाऊँगा।”

—

अगली सुबह दीनदयाल के पाँव फिर गोविंदपुर हॉल्ट की ओर बढ़ रहे थे।

कंधे पर वही अटैची थी। हाथ में वही झोला था। चेहरे पर वही बेबसी थी।

लेकिन इस बार उसके साथ एक और चीज थी—टूटा हुआ विश्वास।

रेलवे हॉल्ट पर पहुँचकर वह उसी जगह बैठ गया, जहाँ कुछ दिन पहले भानु प्रसाद ने उसके पैरों पर झुककर आशीर्वाद लिया था।

ट्रेन आने में अभी समय था।

दीनदयाल दूर तक जाती पटरियों को देखता रहा।

उसका मन अब भी मानने को तैयार नहीं था कि भानु प्रसाद ने उसे छल लिया था। उसे विश्वास था कि शायद यह सब परिस्थितियों का परिणाम है। शायद भानु फिर बदलेगा।

लेकिन सच इससे कहीं अधिक कठोर था।

भानु प्रसाद ने जातिगत भावनाओं, मीठे आश्वासनों, थोड़े-से पैसे और कुशल चुनावी अभिनय के सहारे दीनदयाल जैसे निश्चल मजदूरों की मानवीय संवेदनाओं को अपने राजनीतिक स्वार्थ का साधन बना लिया था।

वोट मिलते ही आश्वासन समाप्त हो गए।

चुनाव समाप्त होते ही अपनापन भी समाप्त हो गया।

दीनदयाल के हाथ में अब केवल खाली झोला नहीं था—उसके हाथ से उसका विश्वास, उसका भरोसा और लोकतंत्र में उसकी आस्था का एक हिस्सा भी छीन लिया गया था।

दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

दीनदयाल उठ खड़ा हुआ।

उसकी आँखें पटरियों पर थीं और मन में एक ही प्रश्न गूँज रहा था—

“क्या लोकतंत्र में वोट केवल चुनाव के दिन तक ही आदमी की कीमत तय करता है?”

ट्रेन हॉल्ट पर आकर रुक गई।

दीनदयाल चुपचाप उसमें चढ़ गया।

गोविंदपुर हॉल्ट पीछे छूट गया।

और उसके साथ पीछे छूट गया वह सपना, जिसमें उसने एक क्षणिक परिवर्तन को स्थायी बदलाव समझ लिया था।

क्योंकि वह निश्चल था…

और शायद यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी।

— डॉ. खुशनंदन मंडल
सीतामढ़ी(बिहार)
लेखक
परिचय
“””””””””””””'”””””
डॉ. खुशनंदन मंडल
******************
राजकीय शिक्षक पुरस्कार एवं अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार सहित दर्जनों शिक्षक व साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित सीतामढ़ी बिहार के चर्चित साहित्यकार व शिक्षक
डॉ. खुशनंदन मंडल शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। वे राजकीय शिक्षक पुरस्कार एवं अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित हैं। वर्तमान में आदर्श मध्य विद्यालय खरपट्टी, प्रखंड रुन्नीसैदपुर, जिला सीतामढ़ी में प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।
साहित्य के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी दर्जनों कहानियाँ, कविताएँ, लघु कथा,निबंध,आलेख एवं जीवनियाँ भारत के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके लेखन में सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएँ, शिक्षा, ग्रामीण जीवन, बाल-मन और समकालीन जीवन की विविध अनुभूतियों का सहज एवं प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
शिक्षा और साहित्य—दोनों क्षेत्रों में सक्रिय डॉ. मंडल ने अपने अनुभवों एवं रचनात्मक लेखन के माध्यम से समाज और नई पीढ़ी को सकारात्मक दिशा देने का निरंतर प्रयास किया है। सीतामढ़ी बिहार के चर्चित साहित्यकार के रूप में उनकी साहित्यिक पहचान निरंतर सुदृढ़ हुई है।
प्रमुख लेखन: कहानी, कविता, आलेख, जीवनी एवं सामाजिक-सरोकार आधारित साहित्य।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *