
6 अक्टूबर हमारे परिवार के लिए वर्ष के अन्य दिनों की तरह बीत जाने वाली कोई सामान्य तारीख नहीं है। यह वह दिन है, जो स्मृतियों के आकाश में एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह आज भी अपनी रोशनी बिखेरता है। यह वह पावन दिन है, जब वाराणसी की पुण्यभूमि पर एक ऐसे व्यक्तित्व ने जन्म लिया, जिसकी जीवन-यात्रा संघर्ष, कर्मठता, संवेदना, पारिवारिक उत्तरदायित्व, धार्मिक आस्था, साहित्य-प्रेम, संगीत-साधना और आत्मीय मानवीय संबंधों से निर्मित हुई। हमारे पापा जी, श्री युगल किशोर अग्रवाल जी का जीवन हमारे लिए केवल किसी व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक की यात्रा नहीं है; वह हमारे लिए संस्कारों की एक ऐसी जीवंत पाठशाला है, जहाँ जीवन को जीने का ढंग, कठिनाइयों का सामना करने का साहस, अपनों के प्रति समर्पण, रिश्तों को निभाने की कला और मनुष्य होने की सार्थकता सहज रूप से सीखी जा सकती है। आज जब समय अपनी अनवरत गति से आगे बढ़ रहा है और जीवन की परिस्थितियाँ निरंतर बदल रही हैं, तब भी उनके व्यक्तित्व की स्मृतियाँ हमारे भीतर उतनी ही ताजा हैं, जितनी किसी पुराने आँगन में खिला हुआ वह फूल, जिसकी सुगंध वर्षों बीत जाने के बाद भी वातावरण में बनी रहती है। वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अनुपस्थिति कभी पूर्ण अनुपस्थिति नहीं बन सकी। उनका स्नेह, उनकी मुस्कान, उनकी वाणी, उनका सहज व्यवहार, उनका संगीत, उनकी धार्मिक आस्था, परिवार के प्रति उनका समर्पण और सबसे बढ़कर उनके द्वारा दिए गए संस्कार आज भी हमारे जीवन में सांस लेते हैं।
वाराणसी केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता, ज्ञान और परंपरा की जीवंत धरोहर है। इसी पावन धरती ने श्री युगल किशोर अग्रवाल जी को जन्म दिया। गंगा की निर्मल धारा, मंदिरों की घंटियाँ, आध्यात्मिक वातावरण और काशी की सांस्कृतिक चेतना ने उनके व्यक्तित्व के निर्माण में निश्चित ही अपनी अमिट छाप छोड़ी होगी। उनका बचपन ऐसे वातावरण में बीता जहाँ जीवन को केवल सुविधाओं से नहीं, बल्कि संस्कारों, श्रम और आत्मसम्मान से समझा जाता था। प्रारम्भिक जीवन से ही उनके भीतर सीखने की जिज्ञासा, आगे बढ़ने की इच्छा और अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प दिखाई देता था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अग्रसेन महाजनी महाविद्यालय से हुई। विद्यार्थी जीवन उनके व्यक्तित्व के निर्माण का महत्वपूर्ण चरण था। उन्होंने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा विज्ञान विषय से पूर्ण की। विज्ञान का अध्ययन उनके तार्किक और व्यावहारिक दृष्टिकोण को विकसित करने वाला रहा, लेकिन उनका व्यक्तित्व केवल तार्किकता तक सीमित नहीं रहा; उसमें संवेदना, साहित्यिक रुचि, आध्यात्मिक विश्वास और कलात्मकता का भी अद्भुत समन्वय दिखाई देता था।
इसके बाद उन्होंने काशी विद्यापीठ से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। स्नातक स्तर पर उनका विषय शास्त्रीय रहा। शिक्षा उनके लिए केवल प्रमाण-पत्र प्राप्त करने का साधन नहीं थी। वे ज्ञान को जीवन को समझने का माध्यम मानते थे। उनका विश्वास था कि मनुष्य जितना सीखता है, उतना ही अपने जीवन और समाज को बेहतर ढंग से समझ पाता है। यही कारण था कि उनके जीवन में शिक्षा और कर्म एक-दूसरे के समानांतर चलते रहे। उन्होंने परिस्थितियों के सामने कभी अपने सपनों को छोटा नहीं होने दिया। पढ़ाई के साथ-साथ जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं को समझते हुए उन्होंने आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया। स्नातक की पढ़ाई करते हुए ही उन्होंने डी.एल.डब्ल्यू. में इलेक्ट्रॉनिक की दुकान प्रारम्भ की। यह निर्णय उनके व्यक्तित्व की दूरदर्शिता और कर्मठता का परिचायक था। एक ओर विद्यार्थी के रूप में पढ़ाई की जिम्मेदारी थी और दूसरी ओर व्यवसाय को संभालने का दायित्व। सामान्य व्यक्ति के लिए ये दोनों भूमिकाएँ एक साथ निभाना कठिन हो सकता है, लेकिन श्री युगल किशोर अग्रवाल जी ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया।
उनके जीवन की यही विशेषता आगे भी बार-बार दिखाई देती है,वे परिस्थितियों से शिकायत करने के बजाय उन्हें अपने परिश्रम से बदलने में विश्वास रखते थे। वे जानते थे कि जीवन में अवसर हमेशा तैयार होकर सामने नहीं आते; कई बार अवसरों का निर्माण स्वयं करना पड़ता है। उन्होंने यही किया। इलेक्ट्रॉनिक की दुकान के माध्यम से उन्होंने अपने भीतर के उद्यमी व्यक्तित्व को पहचाना। जीवन में आगे बढ़ने की उनकी आकांक्षा निरंतर बनी रही। इसी दौरान उनके मन में एक सपना आकार ले रहा था,काश, उनकी नौकरी किसी बैंक में लग जाए। यह सपना केवल नौकरी पाने का सपना नहीं था; इसके पीछे स्थिरता, सम्मान और अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य बनाने की आकांक्षा थी। उन्होंने इस इच्छा को केवल मन में दबाकर नहीं रखा, बल्कि उसके लिए प्रयास किया। अंततः वह दिन भी आया जब उनके परिश्रम को सफलता मिली और उनका चयन यूको बैंक में हेड कैशियर के पद पर हुआ।
यूको बैंक में हेड कैशियर के रूप में उनकी नियुक्ति उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी। यह उनके परिश्रम, लगन और धैर्य की सफलता थी। नौकरी ने उनके जीवन में आर्थिक स्थिरता का आधार अवश्य प्रदान किया, लेकिन उनके व्यक्तित्व की असली समृद्धि कभी धन या पद में नहीं रही। उनकी वास्तविक संपत्ति उनका चरित्र था, उनकी ईमानदारी थी, उनकी संवेदनशीलता थी और उनका परिवार था। वे अपने कार्य के प्रति अत्यंत जिम्मेदार और अनुशासित थे। जिस दायित्व को स्वीकार करते, उसे पूरी निष्ठा से निभाते। उनके लिए कार्य केवल रोजमर्रा की नौकरी नहीं था; वह एक जिम्मेदारी थी, जिसे ईमानदारी से पूरा करना उनका नैतिक कर्तव्य था। जीवन में व्यस्तता चाहे कितनी भी रही हो, उन्होंने अपने पारिवारिक दायित्वों को कभी पीछे नहीं छोड़ा। नौकरी और परिवार के बीच संतुलन बनाए रखना उनके जीवन की बड़ी उपलब्धियों में से एक था।
उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा उस समय सामने आई, जब उनके पिताजी का देहांत हुआ। किसी भी परिवार में पिता का चले जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता; वह घर की छाया, सुरक्षा और मार्गदर्शन के एक बड़े आधार का टूट जाना होता है। ऐसे समय में परिवार के बड़े पुत्र के कंधों पर अचानक अनेक जिम्मेदारियाँ आ जाती हैं। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी ने इस कठिन समय को केवल व्यक्तिगत शोक के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे अपने कर्तव्य का आह्वान समझा। उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठाया और जिस दृढ़ता से उन्हें निभाया, वह उनके व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। उन्होंने अपने छोटे भाइयों को केवल भाई का स्नेह नहीं दिया, बल्कि उनके जीवन के निर्माण में एक अभिभावक की भूमिका भी निभाई। व्यापार के क्षेत्र में उन्हें सहयोग और मार्गदर्शन दिया, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और अपने पैरों पर खड़े हो सकें। उन्होंने अपने लिए जितना सोचा, उससे कहीं अधिक अपने परिवार के भविष्य के बारे में सोचा। उनके भीतर यह भावना गहरी थी कि परिवार का कोई सदस्य पीछे न रह जाए। वे अपने भाई-बहनों की सफलता में अपनी सफलता देखते थे। किसी व्यक्ति के चरित्र की वास्तविक पहचान तब होती है, जब वह अपने सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर दूसरों के जीवन को सँवारने का प्रयास करता है। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी ने यही किया।
अपनी बहनों के विवाह की जिम्मेदारी भी उन्होंने पूरी निष्ठा और समर्पण से निभाई। उस समय पारिवारिक परिस्थितियाँ चाहे जैसी रही हों, उन्होंने अपने दायित्व से कभी मुँह नहीं मोड़ा। बहनों के सुखी भविष्य की चिंता उनके हृदय में सदैव रही। उनके लिए परिवार केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं था; परिवार उनके लिए प्रेम, सुरक्षा, सहयोग और जिम्मेदारी का एक जीवंत संसार था। परिवार के किसी सदस्य की चिंता उनके लिए स्वयं की चिंता थी। वे मानते थे कि जीवन की वास्तविक सफलता तभी है, जब हमारे साथ-साथ हमारे अपने लोग भी सुखी और सुरक्षित हों।इसी भावना ने उन्हें परिवार का आधारस्तंभ बना दिया। वे केवल बड़े भाई नहीं रहे, वे मार्गदर्शक बने; वे केवल पति नहीं रहे, वे जीवन-सहचर बने; वे केवल पिता नहीं रहे, वे बच्चों के भविष्य के निर्माता बने; वे केवल रिश्तेदार नहीं रहे, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए आत्मीय बन गए, जो उनके जीवन से जुड़ा। यही कारण है कि उनके जाने के बाद उनकी स्मृतियाँ केवल एक घर में नहीं, बल्कि उन अनेक हृदयों में जीवित हैं, जिन्हें उन्होंने कभी न कभी अपने स्नेह से छुआ था।
अपने बच्चों के प्रति उनका दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट था। वे चाहते थे कि उनके बच्चे शिक्षा प्राप्त करें, आत्मनिर्भर बनें और जीवन में सम्मान के साथ खड़े हों। लेकिन उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं था। वे जानते थे कि डिग्री मनुष्य को योग्य बना सकती है, लेकिन संस्कार ही उसे अच्छा मनुष्य बनाते हैं। इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, लेकिन साथ ही उन्हें जीवन के मूल्यों की शिक्षा भी दी। उन्होंने सिखाया कि सफलता के साथ विनम्रता आवश्यक है, संपन्नता के साथ संवेदना आवश्यक है और ज्ञान के साथ संस्कार आवश्यक हैं। उनके दिए हुए संस्कार आज भी परिवार के जीवन में दिखाई देते हैं।आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो अनुभव होता है कि उन्होंने हमारे लिए केवल जीवन की आवश्यकताओं की व्यवस्था नहीं की, बल्कि जीवन जीने की दृष्टि भी दी। उन्होंने हमें यह समझाया कि परिस्थितियाँ हमेशा हमारे अनुकूल नहीं होतीं, लेकिन हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में होता है। कठिनाइयाँ आएँगी, संघर्ष होंगे, रास्ते कभी सरल नहीं होंगे, लेकिन यदि मनुष्य अपने भीतर विश्वास और धैर्य बनाए रखे तो कोई भी परिस्थिति उसे तोड़ नहीं सकती। शायद यही कारण है कि उनके जाने के बाद भी हम उनकी स्मृतियों से शक्ति प्राप्त करते हैं। वे आज भी हमारे भीतर किसी अदृश्य मार्गदर्शक की तरह उपस्थित हैं।
श्री युगल किशोर अग्रवाल जी का व्यक्तित्व केवल पारिवारिक जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं था। उनके भीतर धार्मिक आस्था की गहरी जड़ें थीं। वे संकठा माता के परम भक्त थे। काशी की आध्यात्मिक भूमि से उनका लगाव उनके धार्मिक जीवन को एक विशेष गहराई प्रदान करता था। उनकी आस्था केवल बाहरी कर्मकांड नहीं थी। वह उनके जीवन के आचरण में दिखाई देती थी। ईश्वर के प्रति विश्वास ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में धैर्य दिया। संकट के समय उनका मन विश्वास की ओर लौटता था और यही विश्वास उन्हें भीतर से मजबूत करता था। धर्म उनके लिए भय का विषय नहीं, बल्कि विश्वास और आश्रय का विषय था। वे ईश्वर को जीवन का आधार मानते थे और अपनी जिम्मेदारियों को ईश्वर द्वारा सौंपा गया कर्तव्य समझकर निभाते थे। संकठा माता के प्रति उनकी श्रद्धा उनके जीवन की आध्यात्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। उनके भीतर धार्मिकता के साथ-साथ मानवीयता भी थी। वे जानते थे कि पूजा का वास्तविक अर्थ केवल मंदिर में सिर झुकाना नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के सामने संवेदना से हाथ बढ़ाना भी है। उनके व्यवहार में यह मानवीय पक्ष स्पष्ट दिखाई देता था।
उनके व्यक्तित्व का एक अत्यंत मनमोहक और आत्मीय पक्ष था,उनका साहित्य-प्रेम। कथा-साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। वे शब्दों की दुनिया से आत्मीय संबंध रखते थे। साहित्य उनके लिए केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था। वह मनुष्य को समझने का माध्यम था। कथाओं के पात्रों में वे जीवन की विविध परिस्थितियों को देखते थे और शब्दों में मानवीय संवेदनाओं की धड़कन सुनते थे। शायद इसी साहित्यिक संस्कार ने उनके भीतर दूसरों के सुख-दुःख को समझने की क्षमता को और गहरा किया। जो व्यक्ति साहित्य से जुड़ता है, वह केवल शब्द नहीं पढ़ता; वह मनुष्य को पढ़ना सीखता है। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी के व्यक्तित्व में यह विशेषता दिखाई देती थी। वे लोगों की परिस्थितियों को समझते थे। किसी की परेशानी सुनते तो केवल औपचारिकता के लिए नहीं सुनते थे, बल्कि मन से सुनते थे। उनकी संवेदनशीलता सहज थी। उसमें प्रदर्शन नहीं था। वे किसी की सहायता करते तो उसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं समझते थे। उनके लिए सहायता एक मानवीय दायित्व थी, कोई उपलब्धि नहीं।
लेकिन यदि उनके व्यक्तित्व में कोई एक ऐसा पक्ष था, जिसे उनकी जीवन-धड़कन कहा जा सकता है, तो वह था,संगीत।संगीत उनके लिए केवल रुचि नहीं था; वह आत्मा की भाषा था। तबला उनके हाथों में आते ही जैसे उनके व्यक्तित्व का एक नया संसार खुल जाता था। उनकी उंगलियों की थाप में लय होती थी, ताल होती थी और उससे भी बढ़कर भाव होता था। जब वे तबला बजाते थे तो वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा भर जाती थी। परिवार के लोग उनके आसपास बैठते और संगीत की उस सहज दुनिया का हिस्सा बन जाते। वह केवल संगीत सुनने का क्षण नहीं होता था; वह परिवार के साथ जुड़ने, हँसने, आनंद लेने और एक-दूसरे के करीब आने का समय होता था। तबले की थाप में उनकी प्रसन्नता सुनाई देती थी। उनके लिए संगीत जीवन की थकान को दूर करने का माध्यम था। दिनभर की व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बीच संगीत उन्हें अपने भीतर लौटने का अवसर देता था। इसी प्रकार भजन गायन में उनकी आस्था और संवेदना दोनों एक साथ अभिव्यक्त होती थीं। वे भजन अत्यंत मधुरता और भावपूर्ण ढंग से गाते थे। उनके स्वरों में केवल सुर नहीं होते थे; उनमें श्रद्धा होती थी, आत्मीयता होती थी और ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव होता था।
परिवार के बीच उनके द्वारा गाए गए भजनों और बजाए गए तबले की स्मृतियाँ आज भी अनमोल हैं। समय बीत गया, परिस्थितियाँ बदल गईं, लोग अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ गए, लेकिन वे क्षण स्मृतियों में जैसे स्थिर हो गए हैं। कभी-कभी कोई भजन सुनाई देता है तो अचानक लगता है कि वे यहीं कहीं पास बैठे हैं। मन अनायास उस पुराने समय में लौट जाता है, जब उनकी आवाज घर के वातावरण में घुल जाती थी और तबले की थाप जैसे पूरे घर को एक लय में बाँध देती थी।यही तो स्मृतियों की शक्ति है। वे समय को पराजित कर देती हैं। व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसके साथ बिताए हुए क्षण नहीं जाते। आवाज चली जाती है, लेकिन उसकी प्रतिध्वनि रह जाती है। हाथों की थाप रुक जाती है, लेकिन उसकी लय हृदय में चलती रहती है। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी का संगीत भी आज हमारे भीतर उसी तरह बजता है।
उनका स्वभाव अत्यंत स्नेहिल था। उनसे मिलने वाला व्यक्ति बहुत जल्दी उनके अपनत्व का अनुभव करने लगता था। उनके व्यवहार में सहज गर्माहट थी। वे औपचारिक दूरी बनाए रखने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे सामने वाले को अपनेपन का एहसास कराते थे। उनके व्यक्तित्व में ऐसी आत्मीयता थी कि व्यक्ति उनसे अपनी बात कहने में सहज महसूस करता था। उनका प्रेम दिखावटी नहीं था। वे अपने स्नेह का प्रदर्शन नहीं करते थे। उनका स्नेह उनके व्यवहार में दिखाई देता था,किसी की चिंता करने में, किसी की बात ध्यान से सुनने में, किसी कठिनाई में सहायता करने में, परिवार के छोटे-बड़े सदस्यों का हाल पूछने में और बिना कहे किसी की आवश्यकता समझ लेने में। यही सहजता उन्हें विशेष बनाती थी।
उनके भीतर करुणा थी। दूसरों की पीड़ा देखकर उनका मन सहज रूप से द्रवित हो जाता था। वे यथासंभव सहायता करने के लिए तत्पर रहते थे। उनका मानना था कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका व्यवहार है। धन, पद और प्रतिष्ठा समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन किसी के जीवन में दिया गया स्नेह और सहायता लंबे समय तक याद रहती है।शायद इसी कारण उनके जाने के बाद उनके बारे में सोचते हुए सबसे पहले कोई पद या उपलब्धि याद नहीं आती; याद आता है उनका चेहरा, उनकी मुस्कान, उनकी आवाज और उनका अपनापन। यही किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि उसके जाने के बाद लोग उसकी संपत्ति नहीं, उसके व्यक्तित्व को याद करें; उसकी सुविधाएँ नहीं, उसके संस्कारों को याद करें; उसका पद नहीं, उसका प्रेम याद करें।
श्री युगल किशोर अग्रवाल जी ने जीवन में बहुत कुछ सहा। संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा रहे। लेकिन उन्होंने संघर्षों को अपने चेहरे की मुस्कान पर हावी नहीं होने दिया। यह उनकी आंतरिक शक्ति थी। वे जानते थे कि जीवन केवल सुखों का नाम नहीं है। दुःख आएँगे, जिम्मेदारियाँ आएँगी, कठिन समय आएगा, लेकिन मनुष्य को अपनी भूमिका निभाते रहना होगा।
उन्होंने अपने जीवन में इसी सिद्धांत को जिया। उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपने दायित्वों से बड़ा नहीं माना। जब परिवार को उनकी आवश्यकता थी, वे सामने खड़े रहे। जब भाइयों को मार्गदर्शन की जरूरत थी, उन्होंने मार्ग दिखाया। जब बहनों के भविष्य की चिंता थी, उन्होंने जिम्मेदारी निभाई। जब बच्चों के भविष्य का प्रश्न आया, उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें शिक्षा और संस्कार दिए। जब नौकरी की जिम्मेदारी थी, उसे ईमानदारी से निभाया। जब मन को शांति की आवश्यकता थी, वे धर्म और संगीत की ओर लौटे।
उनके जीवन को यदि एक सूत्र में बाँधना हो तो वह सूत्र होगा,कर्तव्य के साथ प्रेम।वे जिम्मेदार थे, लेकिन कठोर नहीं। वे अनुशासित थे, लेकिन संवेदनहीन नहीं। वे धार्मिक थे, लेकिन संकीर्ण नहीं। वे साहित्य-प्रेमी थे, लेकिन केवल कल्पना की दुनिया में रहने वाले नहीं। वे संगीत-प्रेमी थे, लेकिन जीवन की वास्तविक जिम्मेदारियों से दूर नहीं। उनके व्यक्तित्व में जीवन के इन सभी पक्षों का सुंदर संतुलन था।उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि महानता हमेशा बड़े मंचों पर दिखाई नहीं देती। कई बार महानता घर के भीतर दिखाई देती है,जब कोई बड़ा भाई अपने छोटे भाई का हाथ पकड़ता है; जब कोई भाई अपनी बहन के भविष्य की चिंता करता है; जब कोई पिता अपने बच्चों की शिक्षा के लिए अपने सुखों का त्याग करता है; जब कोई व्यक्ति किसी जरूरतमंद की सहायता करके उसे भूल जाता है; जब कोई अपने जीवन की कठिनाइयों के बावजूद दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास करता है।
श्री युगल किशोर अग्रवाल जी की महानता भी इसी सहज जीवन में छिपी थी। उन्होंने कोई असाधारण दावा नहीं किया। उन्होंने अपने जीवन को स्वयं अपने कर्मों से परिभाषित किया। उन्होंने जो किया, वह चुपचाप किया। यही कारण है कि उनके जीवन को याद करते हुए मन में सम्मान के साथ-साथ एक गहरी कृतज्ञता भी जन्म लेती है। परिवार के लिए वे केवल पिता नहीं थे। वे घर की आत्मा थे। उनकी उपस्थिति से घर में एक सुरक्षा का भाव रहता था। ऐसा लगता था कि चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो, कोई है जो रास्ता खोज लेगा। यही विश्वास किसी परिवार को मजबूत बनाता है। पिता का होना केवल आर्थिक सहारा होना नहीं है; पिता वह भाव है जिसमें बच्चे अपने भविष्य को सुरक्षित महसूस करते हैं। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी ने अपने परिवार को यही सुरक्षा दी।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी अनुपस्थिति का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। किसी प्रिय व्यक्ति के चले जाने के बाद जीवन अचानक रुकता नहीं। सुबह होती है, दिन बीतता है, काम होते हैं, लोग मिलते हैं, त्योहार आते हैं, जन्मदिन आते हैं और वर्ष बदलते रहते हैं। लेकिन इन सबके बीच एक स्थान हमेशा खाली रहता है। वह स्थान किसी और से भरा नहीं जा सकता।उनकी अनुपस्थिति भी हमारे जीवन में ऐसी ही एक स्थायी रिक्तता है। लेकिन यह रिक्तता केवल दुःख नहीं देती; यह हमें उनकी स्मृतियों के पास भी ले जाती है। हम जब उन्हें याद करते हैं तो केवल उनके जाने का दुःख नहीं देखते, बल्कि उनके साथ बिताए हुए असंख्य सुंदर क्षणों को भी देखते हैं। उनके साथ बिताया हुआ समय हमारे जीवन की पूँजी है।
कभी उनकी आवाज याद आती है। कभी उनकी मुस्कान। कभी उनका किसी बात पर समझाना। कभी उनका स्नेह। कभी उनका भजन। कभी तबले की थाप। कभी परिवार के बीच उनका सहज बैठना। कभी किसी रिश्तेदार के प्रति उनकी चिंता। कभी बच्चों के भविष्य को लेकर उनका उत्साह। कभी किसी कठिन परिस्थिति में उनका धैर्य। स्मृतियों की यह पूरी दुनिया आज हमारे लिए एक अनमोल विरासत है।मनुष्य शरीर से जाता है, लेकिन उसके संस्कार शरीर के साथ नहीं जाते। वे अगली पीढ़ियों में उतरते हैं। यही किसी जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है। यदि किसी व्यक्ति के जाने के बाद उसकी सोच, उसका व्यवहार और उसके मूल्य उसके बच्चों और परिवार के जीवन में दिखाई देते रहें, तो वह व्यक्ति वास्तव में कभी जाता नहीं।श्री युगल किशोर अग्रवाल जी भी हमारे बीच इसी रूप में जीवित हैं। जब हम किसी जरूरतमंद की सहायता करने की कोशिश करते हैं, तो उनमें उनका संस्कार दिखाई देता है। जब हम परिवार को साथ रखने का प्रयास करते हैं, तो उसमें उनकी सीख दिखाई देती है। जब हम बच्चों की शिक्षा और भविष्य को महत्व देते हैं, तो उसमें उनकी दृष्टि दिखाई देती है। जब हम धार्मिक आस्था से जुड़ते हैं, तो उनकी स्मृति सामने आती है। जब कोई भजन सुनते हैं, तो उनकी आवाज कानों में गूँजती प्रतीत होती है। जब तबले की थाप सुनाई देती है, तो उनका चेहरा स्मृतियों में उभर आता है।
वे हमारे लिए एक ऐसा दीपक हैं, जिसकी लौ दिखाई भले न दे, लेकिन जिसका प्रकाश आज भी हमारे रास्तों को रोशन करता है।उनकी स्मृति हमें केवल अतीत में नहीं ले जाती; वह हमें भविष्य के लिए भी प्रेरित करती है। वे हमें याद दिलाते हैं कि जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, जिम्मेदारियों से भागना नहीं चाहिए। अपने लोगों के लिए खड़े रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की सहायता करनी चाहिए। शिक्षा का सम्मान करना चाहिए। धर्म में विश्वास रखना चाहिए। साहित्य और संगीत जैसी संवेदनशील कलाओं से जुड़े रहना चाहिए। और सबसे बढ़कर मनुष्य बने रहना चाहिए।उनकी जीवन-यात्रा को देखते हुए यह अनुभव होता है कि उन्होंने जीवन को किसी बड़े प्रदर्शन के रूप में नहीं जिया। उन्होंने इसे एक जिम्मेदारी के रूप में जिया। वे जीवन से जितना लेते थे, उससे अधिक अपने परिवार और अपने लोगों को देने का प्रयास करते थे। यही उनकी पहचान थी।
उनका व्यक्तित्व एक शांत नदी की तरह था। नदी अपने प्रवाह का शोर नहीं करती, वह निरंतर बहती रहती है और अपने आसपास के जीवन को सींचती रहती है। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी ने भी अपने जीवन से अनेक लोगों को सींचा। उन्होंने परिवार को संभाला, रिश्तों को जोड़ा, बच्चों का भविष्य बनाया, भाइयों को सहारा दिया, बहनों के जीवन को व्यवस्थित किया और अपने आसपास के लोगों को स्नेह दिया।आज उनकी स्मृति हमारे लिए किसी स्मारक से कम नहीं। लेकिन यह स्मारक पत्थर का नहीं, हमारे हृदय का है। इसमें उनकी तस्वीर नहीं, उनका व्यक्तित्व अंकित है। इसमें उनकी उपलब्धियों की सूची नहीं, उनके संस्कारों की रोशनी है।
6 अक्टूबर आते ही हमारे भीतर एक विशेष भाव जागता है। यह दिन हमें उनके जन्म की स्मृति से जोड़ता है। मन उस समय की कल्पना करता है, जब वाराणसी की धरती पर उनका जीवन प्रारम्भ हुआ होगा। कौन जानता था कि यह बालक आगे चलकर कितने लोगों के जीवन में अपना स्थान बनाएगा? कौन जानता था कि एक दिन उसकी स्मृतियाँ परिवार के लिए जीवनभर का सहारा बन जाएँगी? कौन जानता था कि उसके हाथों की तबले की थाप, उसकी आवाज में गाए भजन और उसकी मुस्कान आने वाली पीढ़ियों की स्मृतियों का हिस्सा बनेंगे? जीवन का यही रहस्य है। हम वर्तमान में जीते हैं, लेकिन हमारे कर्म भविष्य की स्मृतियाँ बनाते हैं। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी ने भी अपने वर्तमान को इस प्रकार जिया कि उनका अतीत आज भी हमारे लिए प्रेरणा है।
उनकी कहानी केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने बैंक में नौकरी की, व्यवसाय किया या अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाईं। उनकी कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने इन सबके बीच अपने भीतर के मनुष्य को जीवित रखा। वे जिम्मेदारियों के बीच भी संवेदनशील रहे। संघर्षों के बीच भी प्रेमपूर्ण रहे। व्यस्तताओं के बीच भी परिवार के लिए उपलब्ध रहे। धार्मिक आस्था के साथ मानवीयता को जोड़े रखा। साहित्य और संगीत के माध्यम से अपने भीतर की संवेदना को जीवित रखा।यही संतुलन उन्हें एक आदर्श व्यक्तित्व बनाता है। आज उनके परिवार के सदस्य जब अपने जीवन की ओर देखते हैं, तो उन्हें अपनी उपलब्धियों के पीछे कहीं न कहीं उनका परिश्रम दिखाई देता है। उन्होंने जो रास्ते बनाए, उन्हीं रास्तों पर चलकर अगली पीढ़ी आगे बढ़ी। उन्होंने जो संस्कार दिए, वही परिवार की पहचान बने। उन्होंने जिस प्रकार जिम्मेदारियों को निभाया, उसी ने परिवार को एक सूत्र में बाँधे रखा।
उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कारों की वह अमूल्य पूँजी है, जिसे कोई समय नष्ट नहीं कर सकता। यह विरासत पुस्तकों में लिखे शब्दों से भी बड़ी है, क्योंकि यह जीवन में दिखाई देती है। परिवार के व्यवहार में, रिश्तों की आत्मीयता में, बच्चों की सोच में और कठिन समय में धैर्य रखने की क्षमता में उनका जीवन आज भी उपस्थित है। उनके बारे में लिखते हुए शब्द कई बार छोटे पड़ जाते हैं। किसी प्रिय व्यक्ति की स्मृति को शब्दों में बाँधना सरल नहीं होता। स्मृतियाँ शब्दों से कहीं अधिक विस्तृत होती हैं। उनमें आवाजें होती हैं, चेहरे होते हैं, स्पर्श होते हैं, घटनाएँ होती हैं, छोटी-छोटी बातें होती हैं और उन सबके बीच भावनाओं की एक पूरी दुनिया होती है। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी की स्मृतियाँ भी ऐसी ही हैं।
उनकी स्मृति में केवल बड़े प्रसंग नहीं हैं। छोटे-छोटे क्षण भी हैं। परिवार के बीच बैठना, बातचीत करना, मुस्कुराना, बच्चों की चिंता करना, किसी की मदद करना, भजन गाना, तबला बजाना, साहित्य पढ़ना,ये सब छोटे लगने वाले क्षण ही आज सबसे बड़ी स्मृतियाँ बन गए हैं।समय हमें सिखाता है कि जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तुएँ अक्सर वही होती हैं, जिन्हें हम जीते समय साधारण समझते हैं। एक साथ बैठकर भोजन करना, पिता की आवाज सुनना, किसी बात पर उनका समझाना, उनके साथ किसी यात्रा पर जाना, उनके पास बैठकर संगीत सुनना,ये सभी क्षण उस समय सामान्य थे, लेकिन आज वही क्षण अनमोल हो चुके हैं।
इसलिए उनकी स्मृति हमें वर्तमान को भी प्रेम से जीने की सीख देती है। उन्होंने अपने जीवन से जो दिया, उसे आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। यदि हम उनके संस्कारों को अपने जीवन में उतारें, परिवार को प्रेम से जोड़कर रखें, जरूरतमंद की सहायता करें, शिक्षा और संस्कृति का सम्मान करें और अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाएँ, तो यही उनके जीवन का सबसे सुंदर सम्मान होगा। वे हमारे लिए एक आदर्श पिता थे, लेकिन उनकी भूमिका पिता से कहीं आगे थी। वे जीवन के शिक्षक थे। उन्होंने पाठ्यपुस्तकों से अधिक जीवन के अनुभवों से हमें सिखाया। उन्होंने बताया कि जिम्मेदारी क्या होती है। उन्होंने बताया कि परिवार क्या होता है। उन्होंने बताया कि सफलता का अर्थ केवल स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि अपने साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाना है। उन्होंने बताया कि प्रेम केवल शब्दों से नहीं, कर्मों से व्यक्त होता है।
उनके जीवन में संघर्ष था, लेकिन संघर्ष के साथ आत्मविश्वास था। उनके जीवन में जिम्मेदारियाँ थीं, लेकिन जिम्मेदारियों के साथ धैर्य था। उनके जीवन में आस्था थी, लेकिन आस्था के साथ कर्म था। उनके जीवन में साहित्य था, लेकिन साहित्य के साथ संवेदना थी। उनके जीवन में संगीत था, लेकिन संगीत के साथ आनंद था। उनके जीवन में परिवार था और परिवार के साथ असीम प्रेम था।शायद इसीलिए उनके व्यक्तित्व को किसी एक शब्द में परिभाषित करना संभव नहीं। वे अनेक गुणों का सुंदर समन्वय थे।उनकी स्मृतियाँ हमें यह भी बताती हैं कि किसी मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके जाने के बाद समझ में आता है। जब वे हमारे बीच थे, तब उनका होना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था। हमें लगता था कि वे हमेशा रहेंगे। लेकिन जीवन की अपनी गति है। एक दिन वह क्षण आया जब उन्हें विदा होना पड़ा। उस विदाई ने हमारे जीवन में एक ऐसा खालीपन छोड़ा, जिसे समय भी पूरी तरह भर नहीं सका।
फिर भी समय ने हमें एक और सत्य सिखाया,प्रेम की कोई मृत्यु नहीं होती।शरीर समाप्त हो जाता है, लेकिन प्रेम बना रहता है। आवाज शांत हो जाती है, लेकिन उसकी स्मृति बनी रहती है। कदम रुक जाते हैं, लेकिन उनके बनाए रास्ते आगे चलते रहते हैं। व्यक्ति चला जाता है, लेकिन उसके संस्कार उसके परिवार के भीतर पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।श्री युगल किशोर अग्रवाल जी हमारे लिए इसी अमर प्रेम और जीवित संस्कारों का नाम हैं।वे हमारे बचपन की स्मृतियों में हैं। वे हमारे पारिवारिक प्रसंगों में हैं। वे हमारे त्योहारों में हैं। वे हमारी प्रार्थनाओं में हैं। वे हमारे संगीत में हैं। वे हमारी सफलता की खुशी में हैं। वे कठिन समय में हमारे भीतर उठते साहस में हैं। वे हमारे बच्चों को दिए जाने वाले संस्कारों में हैं। वे उस हर अच्छे कार्य में हैं, जो उनके जीवन-मूल्यों की याद दिलाता है।कभी-कभी लगता है कि वे कहीं गए ही नहीं। बस दिखाई देना बंद हो गए हैं। उनकी उपस्थिति अब आँखों से नहीं, हृदय से अनुभव होती है। जब हम कोई सही निर्णय लेते हैं, तो मन में लगता है कि वे होते तो यही कहते। जब परिवार एक साथ बैठता है, तो लगता है कि उनकी जगह आज भी खाली है। जब कोई भजन बजता है, तो मन कहता है कि अभी वे तबले की थाप के साथ सुर मिला देंगे। जब कोई पुरानी बात याद आती है, तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और आँखों में नमी।
यही तो सच्ची स्मृति है,जो आँखों को नम भी करे और हृदय को गरिमा से भर भी दे।श्री युगल किशोर अग्रवाल जी की जीवन-गाथा हमें बताती है कि मनुष्य की पहचान उसकी आयु से नहीं, उसके योगदान से होती है। उन्होंने जितने वर्ष जीवन में पाए, उनमें अपने हिस्से की जिम्मेदारियाँ पूरी ईमानदारी से निभाईं। उन्होंने अपने परिवार को संभाला, रिश्तों को सम्मान दिया, बच्चों को शिक्षा और संस्कार दिए, भाइयों और बहनों के लिए अपना कर्तव्य निभाया, अपने कार्यक्षेत्र में निष्ठा रखी और अपने भीतर साहित्य, संगीत तथा धर्म की संवेदना को जीवित रखा।उनकी जीवन-यात्रा साधारण परिस्थितियों में असाधारण मानवीयता की यात्रा थी।उनके प्रति हमारी श्रद्धा केवल इसलिए नहीं है कि वे हमारे पापा जी थे। श्रद्धा इसलिए भी है कि उन्होंने पिता होने के अर्थ को अपने जीवन से सार्थक किया। उन्होंने परिवार को केवल जन्म नहीं दिया, उसे दिशा दी। उन्होंने केवल पालन-पोषण नहीं किया, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण किया। उन्होंने केवल आर्थिक सुरक्षा नहीं दी, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा भी दी। उन्होंने केवल जीवन की सुविधाएँ नहीं दीं, बल्कि जीवन के मूल्य दिए।एक पिता की सबसे बड़ी उपलब्धि यही होती है कि उसकी संतान उसके बाद भी उसके मूल्यों को अपने जीवन में आगे बढ़ाए। इस अर्थ में श्री युगल किशोर अग्रवाल जी आज भी हमारे बीच हैं।
उनका आशीर्वाद हमारे लिए किसी अदृश्य कवच की तरह है। कठिन समय में जब मन कमजोर पड़ता है, तो उनकी स्मृति साहस देती है। जब जीवन में कोई उपलब्धि मिलती है, तो सबसे पहले मन में यही आता है कि काश, आज वे हमारे साथ होते। काश, वे यह सफलता देखते। काश, हम उनके सामने बैठकर कहते कि आपने जो सपने हमारे लिए देखे थे, हम उन्हें पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।लेकिन शायद स्मृतियों की अपनी भाषा होती है। हमें विश्वास है कि जहाँ कहीं भी वे हैं, वे हमारे जीवन को देख रहे हैं और हमें अपना आशीर्वाद दे रहे हैं। हमारी प्रार्थना है कि उनके द्वारा दिए गए संस्कार कभी कमजोर न पड़ें। परिवार की एकता बनी रहे। प्रेम बना रहे। आपसी सम्मान बना रहे। अगली पीढ़ियाँ भी उनके जीवन से प्रेरणा लें। उनके नाम को केवल स्मृति में न रखें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने व्यवहार में जीवित रखें।
यदि उनके जीवन का कोई संदेश है, तो वह यही है,जीवन कितना भी कठिन हो, अपने कर्तव्य से पीछे मत हटो; परिवार कितना भी बड़ा हो, अपनों के लिए हृदय में स्थान बनाए रखो; सफलता कितनी भी मिले, विनम्र रहो; ईश्वर में विश्वास रखो; साहित्य और संगीत जैसी संवेदनशील शक्तियों से जुड़े रहो; और जहाँ संभव हो, किसी के जीवन में थोड़ा-सा सुख जोड़ दो। यही संदेश उनके जीवन की सबसे बड़ी कविता है।
आज 6 अक्टूबर की स्मृति जब हमारे सामने आती है, तो मन एक साथ दो भावों से भर जाता है,वियोग और कृतज्ञता। वियोग इसलिए कि वे हमारे बीच नहीं हैं; कृतज्ञता इसलिए कि हमें उनके जैसे पिता, मार्गदर्शक और संरक्षक का सान्निध्य मिला। यह हमारा सौभाग्य है कि हमने उनके जीवन को देखा, उनके स्नेह को पाया, उनकी सीख सुनी और उनके संस्कारों में पले-बढ़े।हर किसी को ऐसा अवसर नहीं मिलता कि वह अपने जीवन में किसी ऐसे व्यक्तित्व को निकट से देख सके, जिसकी स्मृति समय के साथ धुंधली होने के बजाय और उज्ज्वल होती जाए। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी हमारे लिए ऐसे ही व्यक्तित्व थे।उनकी स्मृति हमारे परिवार की साझा धरोहर है। यह धरोहर किसी संदूक में बंद नहीं की जा सकती। इसे हर पीढ़ी को जीना होगा। उनके जीवन के मूल्यों को आगे बढ़ाना होगा। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।आज भी जब हम उनके बारे में सोचते हैं तो मन कहता है,वे कहीं दूर नहीं हैं। वे हमारे घर की दीवारों में नहीं, हमारे हृदय की धड़कनों में बसे हैं। वे किसी तस्वीर के भीतर कैद नहीं हैं; वे हमारे संस्कारों में चलते हैं। वे किसी पुराने गीत की तरह नहीं हैं जिसे केवल कभी-कभार सुना जाए; वे उस मौन संगीत की तरह हैं जो जीवन के हर क्षण भीतर बजता रहता है।
उनकी मुस्कान हमारी स्मृतियों की रोशनी है। उनकी आवाज हमारे मन की प्रतिध्वनि है। उनका स्नेह हमारी शक्ति है। उनकी सीख हमारा मार्गदर्शन है। उनका जीवन हमारी प्रेरणा है।श्री युगल किशोर अग्रवाल जी का जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि मनुष्य की मृत्यु उसके जीवन का अंत नहीं होती। यदि उसने प्रेम दिया है, तो वह प्रेम जीवित रहता है। यदि उसने संस्कार दिए हैं, तो वे संस्कार जीवित रहते हैं। यदि उसने किसी का जीवन सँवारा है, तो उसका प्रभाव जीवित रहता है। यदि उसने किसी के हृदय में अपना स्थान बनाया है, तो वह व्यक्ति कभी सचमुच विदा नहीं होता।हमारे पापा जी भी कभी विदा नहीं हुए।वे आज भी हमारे साथ हैं,हमारी स्मृतियों में, हमारी प्रार्थनाओं में, हमारे संगीत में, हमारी पारिवारिक परंपराओं में, हमारे निर्णयों में, हमारी सफलताओं में और हमारे संघर्षों में।वे हमारे भीतर उस दीपक की लौ की तरह जल रहे हैं, जो स्वयं भले ही दिखाई न दे, लेकिन जीवन की राहों को रोशन करता रहता है।वे उस वृक्ष की छाया की तरह हैं, जिसके नीचे बैठने वाला व्यक्ति भले ही वृक्ष को हर क्षण न देखे, लेकिन उसकी शीतलता अनुभव करता रहता है।वे उस नदी की तरह हैं, जो दूर निकल जाने के बाद भी अपने प्रवाह की नमी धरती में छोड़ जाती है।वे उस भजन की तरह हैं, जिसकी धुन समाप्त होने के बाद भी मन में देर तक गूँजती रहती है।वे उस तबले की थाप की तरह हैं, जो रुक जाने के बाद भी हृदय की लय में सुनाई देती रहती है।वे उस पुस्तक की तरह हैं, जिसका एक-एक पृष्ठ जीवन को समझने की नई दृष्टि देता है।और वे उस पिता की तरह हैं, जिनका हाथ सिर पर भले ही दिखाई न दे, लेकिन जिनका आशीर्वाद जीवनभर महसूस होता रहता है। श्री युगल किशोर अग्रवाल जी,हमारे पापा जी, हमारे मार्गदर्शक, हमारे संरक्षक, हमारे स्नेह-स्रोत,आप हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन हमारे लिए आपकी उपस्थिति कभी समाप्त नहीं हो सकती। समय बीतेगा, पीढ़ियाँ बदलेंगी, परिस्थितियाँ बदलेंगी, लेकिन आपके द्वारा दिए गए संस्कार हमारे परिवार की आत्मा बने रहेंगे। आपके जीवन की कहानी हमारे लिए केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए प्रकाश-पुंज है।
आपने हमें सिखाया कि रिश्ते निभाए जाते हैं, केवल बनाए नहीं जाते; जिम्मेदारियाँ उठाई जाती हैं, उनसे बचा नहीं जाता; प्रेम जताया ही नहीं, जिया भी जाता है; कठिनाइयों से घबराया नहीं, उनका सामना किया जाता है; और जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं के लिए नहीं, बल्कि अपनों के लिए जीने में है।आपने अपने जीवन से जो दिया, उसे शब्दों में पूरा लिख पाना संभव नहीं। फिर भी इन शब्दों के माध्यम से हम आपकी स्मृति को नमन करते हैं। आपकी सरलता को प्रणाम करते हैं। आपकी कर्मठता को प्रणाम करते हैं। आपके त्याग को प्रणाम करते हैं। आपकी धार्मिक आस्था को प्रणाम करते हैं। आपके साहित्य-प्रेम को प्रणाम करते हैं। आपके संगीत-स्नेह को प्रणाम करते हैं। आपके पितृत्व को प्रणाम करते हैं। आपके उस विशाल हृदय को प्रणाम करते हैं, जिसमें अपने और पराए का भेद बहुत छोटा और मानवता का भाव बहुत बड़ा था।
हमारी यही कामना है कि आपके संस्कार हमारे भीतर कभी कम न हों। हम आपके दिखाए रास्ते पर चल सकें। आपके नाम को केवल स्मरण न करें, बल्कि अपने आचरण से उसे सार्थक करें। हमारे कर्मों में आपकी छवि दिखाई दे, हमारे व्यवहार में आपकी विनम्रता, हमारे निर्णयों में आपकी दूरदर्शिता, हमारे रिश्तों में आपका अपनापन और हमारे जीवन में आपकी संवेदना बनी रहे।ईश्वर से हमारी यही प्रार्थना है कि जहाँ कहीं भी आपकी आत्मा हो, वह शांति और आनंद में हो। संकठा माता की कृपा सदैव आप पर बनी रहे और आपका आशीर्वाद हमारे परिवार पर निरंतर बना रहे। जब भी हम जीवन की कठिन राहों पर चलें, आपकी स्मृति हमें साहस दे। जब भी हम सफलता प्राप्त करें, आपका आशीर्वाद हमारी विनम्रता बनाए रखे। जब भी हम किसी जरूरतमंद से मिलें, आपका संवेदनशील हृदय हमें सहायता के लिए प्रेरित करे। जब भी हम कोई भजन सुनें, आपकी मधुर आवाज हमारे मन में उतर आए। जब भी तबले की थाप सुनाई दे, आपकी उंगलियों की वह लय स्मृतियों में फिर जीवित हो उठे।
आप हमारे जीवन की वह अमूल्य धरोहर हैं, जिसे समय भी हमसे छीन नहीं सकता।आपका जीवन समाप्त नहीं हुआ; वह हमारे जीवन में आगे बढ़ रहा है।आपकी कहानी पूरी नहीं हुई; वह हमारे संस्कारों में लिखी जा रही है।आपका स्नेह समाप्त नहीं हुआ; वह हमारी स्मृतियों में निरंतर बह रहा है।आपकी आवाज शांत नहीं हुई; वह हमारे मन के भीतर आज भी सुनाई देती है।आपकी छाया उठी नहीं; वह आज भी हमारे ऊपर आशीर्वाद की तरह फैली हुई है।और आपका अस्तित्व मिटा नहीं; वह हमारी हर उस अच्छी बात में जीवित है, जो आपके जीवन-मूल्यों से प्रेरित है।हमारे पापा जी, श्री युगल किशोर अग्रवाल जी, आपको शत-शत नमन।आप हमारे बीच भले ही नहीं हैं, लेकिन हमारी धड़कनों में, हमारी स्मृतियों में, हमारी प्रार्थनाओं में, हमारे संस्कारों में और हमारे प्रेम में आप सदैव जीवित रहेंगे,आज, कल और चिरकाल तक।

-मीनू अग्रवाल
(वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
