“समाजसेवा : बदलाव की एक छोटी-सी शुरुआत”
लेख
समाजसेवा केवल बड़े-बड़े कार्य करने का नाम नहीं है। किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी बच्चे को पढ़ने के लिए प्रेरित करना और किसी के भविष्य को बेहतर बनाने की छोटी-सी कोशिश भी समाजसेवा है।
जब मैंने अपने गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा के लिए प्रयास करते देखा, तो मेरे मन में उनके लिए कुछ करने की इच्छा जागी। इसी भावना ने मुझे एकल विद्यालय से जुड़ने की प्रेरणा दी। यहाँ बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन, देशप्रेम और अपने समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी सिखाने का प्रयास किया जाता है।
मेरे लिए बच्चों को पढ़ाना केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक सुखद अनुभव है। शुरुआत में कुछ बच्चे झिझकते थे, खुलकर बात नहीं कर पाते थे। धीरे-धीरे उनके भीतर आत्मविश्वास आया। आज जब वे बिना डर के प्रश्न पूछते हैं, नई बातें सीखने की कोशिश करते हैं और अपने सपनों के बारे में बताते हैं, तो मन को बहुत खुशी मिलती है।
मेरा मानना है कि समाज को बदलने के लिए हमेशा किसी बड़े अवसर का इंतजार नहीं करना चाहिए। बदलाव की शुरुआत हम अपने आसपास से कर सकते हैं। यदि हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार किसी एक बच्चे की शिक्षा, किसी बुजुर्ग की सहायता या किसी जरूरतमंद का साथ देने का संकल्प ले, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आएगा।
समाजसेवा का सबसे सुंदर रूप वही है जिसमें दिखावे से अधिक भावना और स्वार्थ से अधिक सेवा हो। एक छोटी-सी कोशिश किसी के जीवन में बड़ी उम्मीद बन सकती है।
— आचार्या शिखा चंदेल
लेखिका एवं समाजसेविका
एकल विद्यालय, बालूवाला
