मायके के आँगन से बेटियाँ विदा हो जाती हैं , बाबुल का आँगन ,
माँ का आँचल , यादों में सहेजे मुस्काती हैं॥
नन्हे गुड्डे गुड़ियों के ब्याह रचाते रचाते वो न जाने कब परवान चढ़ जाती हैं हो जाती हैं विदा ,मायके की गलियाँ सुनसान कर जाती हैं ,
जो कभी किसी बात पर तुनकती , कभी किसी बात पर भुनकती, इतराती फिरती थी
बस सर झुकाए मायके की दहलीज़ लाँघ जाती हैं ।
सावन के झूले , बचपन की सखियाँ बस यादों में रह जाती हैं , एक घर बसाने को एक घर से हाथ छुड़ा जाती हैं ।
मायके के आँगन से बेटियाँ विदा हो जाती हैं , बाबुल का आँगन
माँ का आँचल , यादों में सहेजे मुस्काती हैं॥
#रेणुका आर्या
