एक टूर, जिसने बच्चों को नहीं… मुझे बदल दिया

एक टूर, जिसने बच्चों को नहीं… मुझे बदल दिया
गुरुकुल कोचिंग सेंटर के बच्चों के साथ टूर पर जाना मेरे लिए आसान निर्णय नहीं था। सच कहूँ तो मैं जाना ही नहीं चाहता था। मन में कई तरह की चिंताएँ थीं- इतने सारे बच्चों को संभालना, उनकी जिम्मेदारी लेना और पूरी यात्रा को व्यवस्थित रखना। लेकिन बच्चों की इच्छा इतनी प्रबल थी कि आखिरकार उनकी खुशी के लिए जाना पड़ा।
और शायद यह मेरी जिंदगी की उन यात्राओं में से एक थी, जिसके लिए मुझे खुद को धन्यवाद देना चाहिए।
पटना के चिड़ियाघर से हमारी यात्रा की शुरुआत हुई। बच्चों ने पहली बार इतने सारे जानवरों को इतने करीब से देखा। इतनी उमस और गर्मी के बावजूद बच्चों की ऊर्जा कम होने का नाम नहीं ले रही थी। एक जगह से दूसरी जगह भागते हुए, हर चीज के बारे में पूछते हुए और अपनी उत्सुकता में खोए हुए बच्चे मुझे बिल्कुल अलग नजर आ रहे थे।
वहीं मैंने पहली बार महसूस किया कि बच्चों को हम अक्सर सिर्फ उनकी पढ़ाई और अंकों के आधार पर देख लेते हैं।
कक्षा में पढ़ाते समय कभी लगता था- यह बच्चा कमजोर है, वह बच्चा पढ़ाई में पीछे है, इसे कितनी बार समझाना पड़ता है… और कभी-कभी इसी वजह से गुस्सा भी आ जाता था।
लेकिन उस दिन उन बच्चों का एक बिल्कुल दूसरा रूप मेरे सामने था।
वे कमजोर नहीं थे।
वे सिर्फ बच्चे थे-मासूम, जिज्ञासु, उत्साही और जिंदगी को अपनी तरह से जीने वाले।
इतने बच्चों के बीच न जाने मेरा वह कठोर स्वभाव कहाँ गायब हो गया था। मन से बस एक ही बात निकली-
“सभी बच्चे कितने मासूम होते हैं!”
बस में लौटते समय तो जैसे पूरा माहौल ही बदल गया। जो बच्चे कक्षा में बहुत कम बोलते थे, वही बच्चे दोस्तों के साथ हँसी-मजाक और ठिठोली कर रहे थे। उनकी बातें सुनकर मैं भी मुस्कुराता रहा।
फिर आया बच्चों का टिफिन।
ऐसा लग रहा था जैसे वे टिफिन लेकर मेरे लिए ही आए हों। हर कोई कह रहा था- “सर, आप भी खाइए।”
बच्चों का वह प्यार कहाँ रोज-रोज मिलने वाला था?
उनका मन रखने के लिए मैंने सबके साथ बैठकर खाया। वह खाना बिल्कुल सादा और घर के स्वाद से भरा था, और उसमें बच्चों का जो अपनापन घुला था, उसने उसे किसी बड़े होटल के छप्पन भोग से भी ज्यादा खास बना दिया था।
सबसे खूबसूरत बात यह थी कि अगर उन्हें डांट भी देता, तो वे थोड़ी देर बाद उसी प्यार से मेरे पास आकर बात करने लगते।
बच्चों का दिल सच में बहुत साफ होता है.
रात में राजगीर पहुँचे। ठहरने के बाद लगा कि अब बच्चे आराम करेंगे, लेकिन बच्चों को शायद नींद से ज्यादा दोस्तों के साथ मस्ती करने की जल्दी थी। हँसी, बातें, शरारतें और दोस्ती- ऐसा लग रहा था जैसे वे कह रहे हों- “ये जिंदगी न मिलेगी दोबारा…”
सुबह राजगीर के प्रसिद्ध गर्म कुंड में स्नान करने का मौका मिला। बच्चों के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। गर्म पानी में डुबकी लगाने के बाद कई बच्चे खुशी से बोले- “सर, सारी थकान मिट गई!”
और फिर वही बच्चों वाली जिज्ञासा- “सर, पानी इतना गर्म क्यों है?”
उस सवाल ने मुझे फिर याद दिलाया कि बच्चे केवल पढ़ाई की किताबों से नहीं सीखते। दुनिया भी उनकी एक बड़ी किताब है.
नाश्ता और पानी के बाद बच्चों ने राजगीर की पहाड़ी पर पैदल जाने का फैसला कर लिया।
मैं बार-बार कहता रहा- “रोपवे से चले जाओ, आसानी होगी।”
लेकिन बच्चों का जवाब था- “नहीं सर, हम पैदल ही चले जाएंगे।”
और वे सभी शिक्षकों के साथ पैदल निकल पड़े।
मेरी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए मुझे रोपवे से जाना पड़ा। लेकिन ऊपर पहुँचकर मेरा अचंभित होना स्वाभाविक था – कुछ बच्चियाँ तो पैदल चलकर हमसे पहले ही वहाँ पहुँच चुकी थीं!
मुझे देखते ही उन्होंने पूरे उत्साह और गर्व से बताया- “हाँ सर! हम लोग पैदल ही आए!”
उस पल मन में उनकी ऊर्जा देखकर गर्व तो हुआ, लेकिन एक शिक्षक का दिल कहाँ मानता है? मैंने तुरंत फिक्र में उन्हें डांटते हुए कहा- “इतनी भी क्या जल्दी थी? आराम से आना चाहिए था न, कहीं चोट लग जाती तो?”
डांट सुनकर वे चुप तो हुईं, लेकिन उनके चेहरों की वह मुस्कान बता रही थी कि उन्हें अपनी इस छोटी सी उपलब्धि पर कितना गर्व है। तब मुझे एहसास हुआ कि ये Gen Alpha के बच्चे हैं… इन्हें कमजोर समझना शायद हमारी सबसे बड़ी भूल है। ये बच्चे बहुत कुछ कर सकते हैं.
इसके बाद हमने राजगीर के विश्व शांति स्तूप का भ्रमण किया। वहाँ का इतिहास बच्चों से साझा किया। बच्चे ध्यान से सुनते रहे, सवाल पूछते रहे और फिर शुरू हुआ आज के दौर का सबसे पसंदीदा ट्रेंड- सेल्फी! पहाड़ों का मनोरम दृश्य देखकर बच्चों की खुशी देखते ही बन रही थी.
नीचे लौटते समय फिर बच्चों की जिद- “सर, पैदल ही नीचे चलेंगे।”
मैंने समझाया – “जब यहाँ आए हो तो रोपवे का अनुभव भी ले लो।”
इस बार बच्चे मान गए और रोपवे का आनंद लिया।
इसके बाद हमारी यात्रा पहुँची मेरे पसंदीदा स्थानों में से एक-बोधगया का महाबोधि मंदिर।
मंदिर परिसर में पहुँचते ही बच्चों का व्यवहार कुछ शांत हो गया। वहाँ की शांति, वातावरण और आध्यात्मिकता ने उन्हें भी गहराई से प्रभावित किया।
उसी दौरान बच्चों ने बोधि वृक्ष को देखा और उनकी एक नई जिद शुरू हो गई-
“सर, हमें बोधि वृक्ष का पत्ता घर ले जाना है!”
मैंने उन्हें प्यार से समझाते हुए कहा- “थोड़ा इंतजार करो, सबको मिलेगा।”
और जब सच में उन्हें वह पत्ता मिला, तो उनके चेहरों की वह खुशी देखने लायक थी। उस पवित्र पत्ते को हाथों में लेकर उनकी आँखें चमक उठी थीं। तभी कुछ बच्चों ने बहुत सहजता से कहा-
“सर, सच में… आपका यह प्रिय स्थान अतिसुंदर है।”
और एक बच्चे की बात आज भी मेरे मन में है- “सर, यह जगह सच में शांति का प्रतीक है।”
बच्चों के मुँह से निकली यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी।
इसके बाद बच्चों को गया के हल्के-फुल्के बाजार में खरीदारी का मौका दिया गया। वहाँ मैंने बच्चों का एक और सुंदर रूप देखा। कोई अपने भाई के लिए कुछ खरीद रहा था, कोई अपनी बहन के लिए, कोई घरवालों के लिए कुछ पसंद कर रहा था। उन्हें देखकर मन में फिर वही विचार आया- “ये बच्चे सिर्फ बच्चे नहीं हैं… इनके भीतर अपने परिवार के लिए जिम्मेदारी और प्यार भी है।”
इस पूरी यात्रा में मैंने बच्चों को जितना देखा, शायद उतना कभी कक्षा में नहीं देख पाया था।
कक्षा में हम बच्चों को उनके नंबरों से पहचानते हैं- कौन प्रथम आया, कौन पीछे रह गया, कौन कमजोर है, कौन तेज है। लेकिन एक शिक्षक के रूप में उस यात्रा ने मुझे सिखाया कि-
बच्चे केवल अंक नहीं होते।
वे भावनाएँ होते हैं।
वे जिज्ञासा होते हैं।
वे सपने होते हैं।
वे मासूमियत होते हैं।
और सबसे बढ़कर… वे प्यार होते हैं।
जिस बच्चे पर कभी पढ़ाई को लेकर गुस्सा आया था, उसी बच्चे के साथ बैठकर हँसना अच्छा लगा। जिसे कभी कमजोर समझा था, उसे पहाड़ पर मुझसे आगे जाते देखकर गर्व हुआ। जिसे कम बोलने वाला समझता था, उसे बस में खुलकर हँसते देखकर खुशी हुई। और जिन बच्चों को हमेशा अनुशासन में रखने की कोशिश करता था, उन्हीं बच्चों के बीच मेरा अपना कठोर स्वभाव कहीं पीछे छूट गया।
शायद शिक्षक होना केवल बच्चों को पढ़ाना नहीं है। कभी-कभी बच्चे ही शिक्षक बन जाते हैं… और हमें जिंदगी का सबसे सुंदर पाठ पढ़ा जाते हैं।
मेरे लिए यह यात्रा केवल पटना, राजगीर और गया घूमने की यात्रा नहीं थी। यह मेरे और मेरे बच्चों के बीच एक ऐसा रिश्ता बनाने वाली यात्रा थी, जिसे शायद कोई किताब, कोई परीक्षा और कोई अंक कभी नहीं बना सकता।
मेरे प्यारे बच्चों,
इस खूबसूरत यात्रा को इतना यादगार बनाने के लिए आप सभी का दिल से धन्यवाद.
आपने मुझे बहुत कुछ सिखाया है।
और शायद इस यात्रा के बाद जब मैं अपनी कक्षा में वापस जाऊँगा, तो बच्चों को सिर्फ यह सोचकर नहीं देखूँगा कि कौन पढ़ाई में कमजोर है और कौन मजबूत।
मैं उन्हें देखकर यह भी याद रखूँगा-
हर बच्चा अपने आप में खास है।
हर बच्चे के भीतर एक खूबसूरत दुनिया है।
बस उसे देखने के लिए शिक्षक की नजर बदलनी चाहिए।
✍️ राहुल सोनी
गुरुकुल कोचिंग सेंटर
हसन बाजार, भोजपुर, बिहार
📞 8581020240

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