अनहद नाद

अनहद नाद

आज समाज के शोर में अनहद नाद सुनाई देता है।
मनुष्य के भीतर का मनुष्य कहीं दूर दिखाई देता है।।

देश की मिट्टी पूछ रही, मूल्य कहाँ खो गए हैं।
स्वार्थ की आँधी में कितने रिश्ते सो गए हैं।।

दुनिया आगे बढ़ती है, फिर भी मन क्यों खाली है।
चेहरों पर मुस्कान बहुत, आँखों में बदहाली है।।

नैतिकता के दीपक अब धुँधले-से लगते हैं।
सच बोलने वाले भी अक्सर अकेले जगते हैं।।

ज्ञान बढ़ा, विज्ञान बढ़ा, पर विवेक घटा है।
मानवता के आँगन में अहंकार बढ़ा है।।

धन की चमक ने मन के उजाले को ढक डाला।
ममता के रिश्तों पर भी मतलब का रंग चढ़ा डाला।।

समाज बदल रहा है, पर दिशा कौन बताएगा।
देश तभी सँवरेगा जब चरित्र जाग पाएगा।।

दुनिया को बदलने से पहले खुद को बदलना होगा।
नैतिकता के दीप से अँधियारा हरना होगा।।

जब अंतरमन से उठेगा सत्य का निर्मल स्वर।
तभी सुनाई देगा भीतर वह अनहद नाद अमर।।

डॉ राम शरण सेठ
छटहाॅं मिर्जापुर उत्तर प्रदेश

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