मन तू मेरे! मन की, मन में ही रखना
हरगिज़ किसी से ना, मन की कहना
जो भावों को समझें, समझो ठीक है
जो अभावों को समझें, समझो नजदीक है
वन में भी, मन मयूर बन, मगन ही रहना
हरगिज़ किसी से ना…
जो कांटों में चलते, समझो मीत हैं
जो झंझटों में खटते, समझो मनमीत है
घन से भी, मन ग़यूर बन, सघन ही रहना
हरगिज़ किसी से ना…
जो वादों से पलटे, समझो नीच हैं
जो संवादों से सुलटे, समझो नाचीज़ हैं
धन से भी, मन सुदूर बन, मनन ही रहना
हरगिज़ किसी से ना…
* विपिन कुमार सोनी©
15.09.2026
ग़यूर – स्वाभीमानी, खुद्दार
