बाबा रामदेव
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विक्रम संवत 1409 ,भाद्रपद शुक्ल द्वितीया,
तंवर वंशीय राजपूत परिवार में खुशियाली आई।
बाबा रामदेव के किलकारी से बज उठी शहनाई,
वाड़मेर राजस्थान के उड्डू कासमेर में बॅंटी मिठाई।
पिता राजा अजमल व माता मैणा देवी कहलायीं,
गुरुवाली नाथजी से उन्होंने योग और शिक्षा पाई।
शिक्षा पाकर,वे जैसलमेर में रूणिचा गॉंव बसाये,
राजस्थान के महान लोक देवता, रूणिचा रा धणी कहलाये।
पोकरण और रुणिचा के निकट,भैरव खुब थेआतंक मचाये,
जिस राक्षस का बध कर वे ,श्रीकृष्ण के अवतार हैं कहलाये।
राजस्थान के महान लोक देवता, कई चमत्कार दिखलाये,
शक्ति परीक्षा के लिए जब ,मक्का से पांच पीर थे आये।
रामदेव ने बड़े हर्ष से उन्हें निमंत्रण दे,भोजन पर बुलवाये,
मक्का में बर्तन छुटने का बहाना बना, पीरो ने थे निमंत्रण ठुकराये।
पलक झपकते उनके बर्तन,मक्का से रामदेव थे मंगवाये,
वजह बना पांचों पीर,और रामदेव”रामसा पीर” कहलाये।
समाजिक छुआ-छूत,भेद-भाव मिटाने को, वे थे संदेश फैलाये,
गरीब और जरूरतमंदों की सेवा कर वे, उन्हें थे लाभ पहुंचाये।
रुणिचा का रक्षक बन, बाबा रामदेव,”रूणिचा रा धणी”कहलाये,
छोटे जीवन काल में हीं,अपने कृत से वे बहुत हीं नाम कमाये।
विक्रम संवत १४४२भादवा सुदी एकादशी को जीवित समाधि ले,
पीरो का पीर ,रामसा पीर,जैसलमेर को एक पुनित तीर्थ बनाये।
———स्वरचित एवं मौलिक
अभय नंदन प्रसाद श्रीवास्तव उर्फ रवि शंकर श्रीवास्तव;अधिवक्ता/कटिहार (बिहार)
