अंदर की खामोशी”
किस बात का दिखावा करूँ मैं,
जब भीतर ही भीतर टूट रही हूँ।
न कोई तमाशा रचा जीवन में,
बस चुपचाप खुद से ही रूठ रही हूँ।
चेहरे पर मुस्कान सजा लेती हूँ,
पर आँखों में थकान उतर आती है।
लोग पूछते हैं — “सब ठीक है न?”
और मेरी चुप्पी ही जवाब बन जाती है।
अपने मन को लाख समझाऊँ,
पर ये चंचल सा क्यों रो पड़ता है?
हृदय में कितनी पीड़ा छुपी है,
जो शब्दों तक आते-आते खो जाता है।
न जीने से मुझे शिकायत है,
न मरने की कोई आरज़ू है।
बस कभी-कभी ये मन चाहता है,
कि कोई बिना कहे मेरी हालत समझ ले।
भीड़ में रहकर भी तन्हा हूँ मैं,
शोर में भी सन्नाटा लगता है।
सब अपने हैं फिर भी न जाने क्यों,
दिल हर पल थोड़ा-
