गूंगे इंसान

गूंगे इंसान

देख कर अन्याय को
ना उठा सके आवाज,
हम विहीन इस समाज को
ना दे सके सत्य का साथ।
वह गूंगे हकदार हैं हम।

चीखती है बेबसी जब,
फेर लेते हैं हम अपनी नजर।
“अपना क्या नुकसान है?”
सोच कर बढ़ा लेते हैं अपनी कदम।

मौन की चादर लपेटे
सो रहा समाज है।
आज जो निःशब्द (खामोश) है,वह कल के बेजुबान है।

बिक रही है रुह यहां,
बिक रहा ईमान है।
खामोश है इंसानियत,
देख रहा सारा जहान है।

क्यों कहें कल की पीढ़ी से
कि लचर थे हम?
देखकर अन्याय को
ना उठा सके।
वो गूंगे इंसान थे हम।

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