मैंने प्रेमचंद को
किसी पुराने पन्ने पर नहीं,
उस खेत की दरारों में पढ़ा है
जहाँ बीज से पहले
किसान अपना विश्वास बोता है।
मैंने उन्हें देखा है
उस पगडंडी पर
जो गाँव से शहर तक तो जाती ,
पर लौटते समय
अपने साथ कई अधूरे स्वप्न
और थोड़ी-सी थकान ले आती ।
आज भी
किसी घर का बुझा हुआ चूल्हा
जब धुएँ की जगह
एक प्रश्न उठाता है,
तो लगता है—
किसी कहानी का पात्र
पुस्तक से निकलकर
हमारे समय के सामने खड़ा है।
चेहरे बदल गए,
नाम बदल गए,
समय ने अपने वस्त्र बदल लिए—
पर भूख की आँखों में
वही पुराना सन्नाटा है,
श्रम की हथेलियों पर
वही कठोर लिपि,
और न्याय के दरवाज़े पर
वही लंबी प्रतीक्षा।
कहीं कोई होरी
अब भी मौसम से अधिक
व्यवस्था से डरता है,
कहीं कोई धनिया
अपने साहस की गठरी बाँधे
पूरे घर का आकाश
अपने कंधों पर उठाए है।
और कहीं
मनुष्य के आगे
उसकी जाति लिख दी जाती है—
जैसे जन्म
उसका अपराध हो,
जैसे पृथ्वी ने स्वयं
मनुष्यों के बीच
कोई दीवार खींची हो।
तभी प्रेमचंद
मेरे भीतर एक प्रश्न बनकर
धीरे से जागते हैं—
साहित्य आखिर क्या है?
शब्दों की सुंदर सजावट,
या उस मौन की आवाज़
जिसे सदियों से
बोलने का अवसर नहीं मिला?
मैं उत्तर खोजता हूँ
तो खेत दिखाई देते हैं,
फटी हथेलियाँ दिखाई देती हैं,
घूँघट के भीतर छिपा प्रतिरोध
और अभाव में पलता हुआ
एक बच्चे का स्वप्न दिखाई देता है।
तब समझ आता है—
प्रेमचंद तक पहुँचने के लिए
किसी पुस्तकालय का पता
पर्याप्त नहीं।
मनुष्य के दुःख तक जाना होगा,
उसकी अस्मिता के पास बैठना होगा,
उसकी चुप्पी की भाषा सीखनी होगी,
और अपनी कलम को
सुविधा की मेज़ से उठाकर
जीवन की धूल में रखना होगा।
क्योंकि प्रेमचंद
केवल एक लेखक नहीं—
भारतीय समाज के माथे पर रखा
वह दर्पण हैं
जिसमें इतिहास भी
अपना चेहरा देखने से
बच नहीं सकता।
जब मेरी कविता
किसी भूखे की थाली तक पहुँचती है,
किसी किसान के प्रश्न से मिलती है,
किसी वंचित की आवाज़ के साथ
दो कदम चलती है—
तब शब्द
सिर्फ शब्द नहीं रहते,
वे मनुष्यता की ओर खुलती
एक छोटी-सी राह बन जाते हैं।
और उसी राह पर
चलते-चलते
मुझे लगता है—
मैं प्रेमचंद को पढ़ नहीं रहा,
अपने समय को पढ़ते हुए
प्रेमचंद के करीब जा रहा हूँ।
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विनोद कुमार, 8709036750
