नर भेड़िया

नर भेड़िया

सुबह-सुबह की अखबार में,
कुछ छपी थी पंक्तियाँ,
न्यूज चैनलों के एपिसोड में,
कुछ सुनी थी पंक्तियाँ!!

दरिंदों के एक भीड़ में,
उठी थी फिर वही हवस की आग,
आज फिर कलयुगी दुःशासन,
हर रहा एक द्रौपदी की लाज!!

कौन-कौन था उस भीड़ में,
कर रही मुझे यह गुमराह,
कोई खादी या फिर खाकी,
था जल्लाद या नागरिक जिम्मेदार!!

मौन थी प्रकृति वहाँ,
मौन था धरा-गगन,
बता रही हवा वहाँ की,
हुआ यहीं पर ‘सतीत्व-हरण’!!

शर्मसार थी नदियाँ वहाँ की,
और लज्जित थे रजकण,
दास्ताने कह रही थी,
किसी ‘आत्मजा’ की उजड़ी उपवन!!

काम थी छोटी-सी,
घर से निकली थी मैं आज,
जिस्म मेरी ढकी हुई थी,
पूरी लिबास के साथ!!

ना चेहरे पर कोई लेप था,
ना भरकाऊ पोशाक,
फिर क्यों मैं ही बनी,
दरिंदों के भूख की शिकार!!

ना था कोई कृष्ण वहाँ,
जो सैरन्ध्री की चीर दे,
और न ही था लक्ष्मण वहाँ,
जो मर्यादारेखा खींच दे!!

बस गीदड़ों की भीड़ थी,
जो नोच रही थी बेटियाँ,
भेड़ियों की झुंड थी जो,
खींच रही थी चमड़ियाँ!!

“बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ”
“सुकन्या समृद्धि” योजना चलाओ,
बालिका छात्रवृत्ति या पोशाक दिलाओ,
या महिला सहायता समूह चलाओ!!

पर क्या फायदा इन योजनाओं का,
जब देश में बेटी ना हो सुरक्षित,
क्या फायदा इन कानूनों का,
जो स्वयं ‘कोख’ को कर रहा कलंकित!!

पूछती है हिन्दुस्तान से,
इस देश के नौजवान से,
आखिर कब तक छपती रहेंगी ये पंक्तियाँ???????
आखिर कब तक छपती रहेंगी ये पंक्तियाँ ??????

लेखिका—नूतन झा

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