आज मैं देख्यो, राधा-किसन कूँ बन में।
बाँसुरी बजाये मोहन, प्रेम पागे मोहिनी कै दृगन में।
घघरी ह्वै घूम रही, प्रिया नाचे गाय रही।
देखन तै दोनों, मोरी लौ हिल-हिल जाय रही।
तिरछी चितवन सों चितचोर निहार रह्यो,चंचल पग ह्वै मोहन,आप आगे जाय रह्यो ।
करे अठखेलियाँ स्याम, राधिका की अलक सों,
फरकन लगी मोरी लौ,जरि जाय बिन घृत सों।
जमुना के तीर पै, तमस-तिमिर में,मोरी लौ राह तै दिखलाय रही।
सुरूपा के कोमल कमल-कर, मोरी सैया बनि जाय रही।
पिछूं छोडि बन कूँ, सुकुमारी दौड़ी जाय रही।
पाछे चले भये स्याम, सौम्या गीतन कूँ गाय रही।
मोहन सुमन सौ रम्या के केश सजाय रहे,
सुनि मुरली मोहन की जमुना उफाय रहे।
गोपी बने तरु, कैसा रास रचाय रही,
बनि रैनि रास की साखी, मोरी लौ हरसाय रही।
आज मैं देख्यो, राधा-किसन कूँ बन में,
बाँसुरी बजाए मोहन, प्रेम पागे मोहिनी कै दृगन में।
मोक्षिका पारीक ‘ शिवांगना ‘
