एक शोधार्थी की पीड़ा

कक्षा में जब मैं पहुँचा था,
मन में नए विचार लिए,
ज्ञान की ज्योति जलाने को,
कुछ सुंदर से उपहार लिए।
कुछ आँखों में जिज्ञासा थी,
कुछ चेहरों पर मुस्कान मिली,
जब बात समझाने बैठा मैं,
कुछ छात्राओं से पहचान मिली।
पर कुछ मन जैसे भटके थे,
शोर में जिनका संसार था,
पुस्तक से जिनका नाता कम,
मोबाइल ही आधार था।
मैं सोच रहा था शोधार्थी बन,
क्यों बदला शिक्षा का व्यवहार?
क्यों गुरु अब गुरु न रह पाया,
क्यों कमजोर हुआ सम्मान का तार?
क्या दोष अकेला बच्चों का है?
या समाज कहीं जिम्मेदार है?
क्या शिक्षा अब बाजार बनी,
जहाँ ज्ञान भी एक व्यापार है?
फिर भी आशा का दीप लिए,
मैं हार मानने वाला नहीं,
एक भी छात्र यदि जाग गया,
तो मेरा प्रयास व्यर्थ नहीं।
क्योंकि शिक्षक का सच्चा सम्मान,
तालियों से नहीं मिलता है,
वर्षों बाद किसी विद्यार्थी की,
सफलता में वह खिलता है।
इसलिए आज भी विश्वास है,
शिक्षा से होगा नव निर्माण,
जब गुरु-शिष्य के बीच पुनः,
जगेगा सम्मान और ज्ञान।
– राहुल सोनी हसन बाजार भोजपुर
M.Sc., M.Ed.
शोधार्थी, शिक्षा एवं मनोविज्ञान
आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी

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